बैठे हैं मगरमच्छ, कदम-कदम पर घात
शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग इस मायने में बेहद खतरनाक खेल है क्योंकि यहां नोट से नोट बनाए जाते हैं। हर्र लगे न फिटकरी, रंग भी चोखा आए। शेयरों में निवेश से धन-दौलत तभी बनती है, जब कंपनी अच्छा धंधा करती है। वहां कंपनी प्रबंधन के कौशल व मेहनत से मूल्य का सृजन होता है और उसका एक अंश शेयरधारक होने के नाते हमें मिलता है। लेकिन ट्रेडिंग तो ज़ीरोसम गेम है। एक का नुकसान, दूसरे का फायदा।औरऔर भी
पूर्व वित्त सचिव ने खोला सरकार का भेद, पूंजी व्यय बढ़ाने का दावा है पूरा का पूरा झूठा
केंद्रीय वित्त मंत्रालय में जुलाई 2017 से लेकर जुलाई 2019 तक आर्थिक मामलात के सचिव से लेकर वित्त सचिव तक रह चुके सुभाष चंद्र गर्ग ने मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। पिछले ही महीने उनकी किताब, ‘वी आलसो मेक पॉलिसी’ का एक अंश अखबारों में सुर्खियां बन गया था जिसमें खुलासा किया गया था कि 14 सितंबर 2018 को एक बैठक में रिजर्व बैंक द्वारा केंद्र सरकार को धन देने से मना करने परऔरऔर भी
ज्यादा ट्रेड करना होता है घाटे का सौदा
शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग लालच व भय की आदिम भावनाओं का खेल है। इसका नियंत्रण हमारे शरीर मे भीतर ही भीतर रिसने वाला एक हॉर्मोन एड्रेनालाइन करता है। इसे ‘फाइट-ऑर-फ्लाइट हॉर्मोन’ के रूप में भी जाना जाता है। इसका स्राव शरीर में तनावपूर्ण, रोमांचक, खतरनाक या खतरे की स्थिति के जवाब में खुद-ब-खुद होने लगता है। यह प्रकृति की बनाई व्यवस्था है। एड्रेनालाइन हमारे शरीर को अधिक तेज़ी से प्रतिक्रिया करने में मदद करता है। असल मेंऔरऔर भी
शेयर बाज़ार है पंटरों-पंटरों का ही खेल!
देशी-विदेशी संस्थाएं औरों का धन ही शेयर बाज़ार में लगाकर मैनेज करती है। लेकिन लाख टके का सवाल है कि दूसरे के धन को मैनेज करने का यह काम दरअसल होता क्या है? इसमें काम यह नहीं होता कि दुनिया कैसे काम करती है, युद्ध छिड़ा है या शांति है, यहां तक कि अर्थव्यवस्था कैसे काम कर रही है, इससे भी इसका कोई मतलब नहीं होता। यहां तो बस उन स्टॉक्स को पकड़ना होता है जो दूसरेऔरऔर भी
बाज़ार गिरे, मगर वे हमेशा चढ़ाते क्यों!
म्यूचुअल फंड से लेकर बैंक, बीमा कंपनियां और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) तक अपने धन पर नहीं, दूसरों के धन पर धंधा करते हैं। दूसरों को जब तक ज्यादा कमाकर देते हैं, तब तक वे उनके साथ बने रहते हैं। नहीं तो छोड़कर कहीं और चले जाते हैं। सभी देशी-विदेशी निवेशक संस्थाएं सिस्टम बनाकर चलती हैं और अमूमन उनका धंधा बराबर बढ़ता ही रहता है। कमाल की बात यह है कि बाज़ार गिरता है, तब भी उनकेऔरऔर भी





