छोटे शहरों-राज्यों से ज्यादा बढ़े निवेशक
नोट करने की बात है कि म्यूचुअल फंड की एसआईपी में छोटे शहरों के निवेशक ज्यादा रफ्तार से बढ़ रहे हैं। वे दस साल पहले तक बैंक खातों में जो रिकरिंग डिपॉजिट किया करते थे, उसकी जगह म्यूचुअल फंड की एसआईपी ने ले ली है। 2013-14 में पूरे साल में एसआईपी से 14,500 करोड़ रुपए आए थे। अब तो हर महीने 15,000 करोड़ रुपए से ज्यादा आ रहे हैं। यह भी खास बात है कि म्यूचुअल फंडऔरऔर भी
एफपीआई पर भारी लोगों की एसआईपी
अपने शेयर बाज़ार में 3 अक्टूबर से 17 नवंबर के दौरान जब विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने शुद्ध रूप से 37,472.82 करोड़ रुपए निकाले, उसी दौरान देशी संस्थागत निवेशकों (डीआईआई) ने 37,489.85 करोड़ रुपए की शुद्ध खरीद की। एफपीआई से थोड़ी-सी ज्यादा। असल में डीआईआई के भीतर खास भूमिका निभा रहे हैं म्यूचुअल फंड और म्यूचुअल फंडों में नियमित धन का प्रवाह सुनिश्चित कर दिया है आम लोगों द्वारा की जा रही एसआईपी या सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लानऔरऔर भी
एफपीआई अब नहीं बाज़ार के निर्णायक
शेयर बाज़ार के निवेश में समझदार कौन? विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) या देशी संस्थागत निवेशक (डीआईआई)? इनमें से कौन तय करता है हमारे बाज़ार की दशा-दिशा? आम मान्यता है कि एफपीआई या एफआईआई ही इसे तय करते हैं। लेकिन यह मान्यता अब हकीकत से दूर जाती नज़र आ रही है। पहले विदेशी निवेशकों के बेचने से अपना बाज़ार जितना गिरता था, अब उतना गिर तो नहीं ही रहा, बल्कि बढ़ जा रहा है। मसलन, अगस्त 2011 मेंऔरऔर भी
सिर चढ़े शेयरों को करें दूर से ही सलाम
शेयर बाज़ार दिन, महीने, साल हमेशा लहरों में चलता है। बाज़ार में ऐसा दौर होता है जब बहुत सारे शेयर आकर्षक भावों पर मिल रहे होते हैं। वहीं, ऐसा भी दौर होता है जब बहुत सारे शेयर काफी महंगे भाव पर चल रहे होते हैं। जो निवेशक बाज़ार की लहर के निचले स्तर या शेयरों को आकर्षक भाव पर खरीदते हैं, वे अक्सर दो-तीन साल में अच्छा कमा लेते हैं। वहीं, जो निवेशक बाज़ार की लहर केऔरऔर भी






