अर्थव्यवस्था के साथ सब अच्छा तो नहीं!
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंतरिम बजट को समावेशी व इनोवेटिव बताया है। मगर यह न तो समोवेशी है और न ही इनोवेटिव। जिस विकास में रोज़गार ही नहीं बन रहा, वो समावेशी कैसे हो सकता है? खुद सरकार के आवधिक श्रम शक्ति सर्वेक्षण (पीएलएफएस) के अनुसार देश में नियमित वेतन वाला रोज़गार पांच साल से ठहरा हुआ है। अधिकांश रोजगार जो बना है, वो अवैतनिक पारिवारिक श्रम या प्रछन्न बेरोज़गारी है। कृषि में वास्तविक मजदूरी घटी है।औरऔर भी
सब कुछ नकली, सारा कुछ हवा-हवाई!
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर उनके तमाम मंत्री-संत्री दावा कर रहे हैं कि 2014 से पहले भारत दुनिया की उन पांच नाजुक अर्थव्यवस्थाओं में गिना जा रहा था जो विकास की फंडिंग के लिए अविश्सनीय विदेशी निवेश पर निर्भर थे। लेकिन साथ ही उनका दावा है कि 2014 से 2023 के बीच देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) दोगुना होकर 596 अरब डॉलर रहा है। इतना नकलीपना क्यों? पहले जो विदेशी निवेश कमज़ोरी की निशानी था, वहीऔरऔर भी
श्रेय की राजनीति से रिश्ता अर्थनीति का!
बजट की झांकी निकल गई। अब आम चुनावों की रैलियां निकलने लगी हैं। प्रधानमंत्री कहते हैं कि अयोध्या में राम मंदिर बनने से पीढ़ियों का इंतज़ार खत्म हुआ। उन्होंने 17वीं लोकसभा का अंतिम सत्र राम के नाम कर दिया। दरअसल, राम को घोड़ा बनाकर भाजपा चुनावों का अश्वमेध यज्ञ पूरा करना चाहती है। लेकिन उसे भरोसा नहीं कि राम का सिक्का कितना चल पाएगा। इसीलिए 2004 से 2014 तक कांग्रेस के राज में अर्थव्यवस्था के हाल परऔरऔर भी
अर्थव्यवस्था व बाज़ार के लिए शुभ नहीं!
इस समय अपनी अर्थव्यवस्था ही नहीं, शेयर बाज़ार तक का हाल विचित्र है। अर्थव्यवस्था में 17% का योगदान करनेवाली केंद्र व राज्य सरकारों का हाल दुरुस्त है। मगर, बाकी 83% योगदान करनेवाले छोटे-बड़े उद्योगों व आम घरों का हाल पस्त है। शेयर बाज़ार में उन कंपनियों के शेयर चमकते ही जा रहे हैं, जिनका धंधा सरकारी खपत पर टिका है। आईआरबी इंफ्रा जैसी कंपनी का शेयर साल भऱ तीन गुना हो चुका है। भारत इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकरऔरऔर भी






