जिस मानव संसाधन या डेमोग्राफिक डिविडेंड पर हमारी अर्थव्यवस्था का सारा दारोमदार है, वही सबसे ज्यादा उपेक्षित है। देश में 1968 की शिक्षा नीति में तय हुआ था कि केंद्र व राज्य सरकारें मिलकर हर साल जीडीपी का 6% शिक्षा पर खर्च करेंगी। 1986 की नीति में भी यही लक्ष्य दोहराया गया। अभी सबसे नई बनी 2020 की शिक्षा नीति में भी वही लक्ष्य दोहराया गया है। लेकिन हकीकत यह है कि यह लक्ष्य आज तक कभीऔरऔर भी

ज्यादा कर्जदार देश को समृद्ध नहीं माना जा सकता। विकास का अगला पैमाना है कि औसत भारतीय कितना खुशहाल हुआ है? इसे जीडीपी के समग्र आकार से नहीं, बल्कि प्रति व्यक्ति जीडीपी से मापा जाएगा। मार्च 2014 में हमारा प्रति व्यक्ति जीडीपी 1559.86 डॉलर था। यह मार्च 2023 में 2612.45 डॉलर रहा है। यह गणना मौजूदा मूल्यों पर की गई है। अगर नौ सालों में औसत मुद्रास्फीति की दर को 5% मानें तो 2014 के 1559.86 डॉलरऔरऔर भी

निरर्थक बहसों में उलझाकर अवाम का ध्यान भटकाया जा रहा है और देश के भविष्य को खतरे में डाला जा रहा है। राजनीति में राम का घटाटोप तो आर्थिक मोर्चे पर जीडीपी के आकार का वितंडा। जीडीपी पांच ट्रिलियन डॉलर हो जाने का मतलब विकास नहीं होता। विकास का मतलब है देश की समृद्धि और औसत देशवासी की खुशहाली। क्या पिछले नौ सालों में देश समृद्ध हुआ है? देश पर मार्च 2014 में आंतरिक व बाहरी, दोनोंऔरऔर भी

एक बात जान लें कि भारत की विकासगाथा को अगले 15-20 साल तक कोई आंच नहीं आने जा रही। घटिया से घटिया सरकार आ जाए, पर हमारे कॉरपोरेट क्षेत्र का बढ़ना तय है। इसलिए लम्बे समय में हमारे शेयर बाज़ार का कुलांचे मारना भी पक्का है। ध्यान रहे कि शेयर बाज़ार हमेशा लहरों में चलता है। कभी नीचे तो कभी ऊपर। नीचे गिरने पर खरीदना और ऊपर जाने पर मुनाफा निकाल लेना। कुशल ट्रेडर या निवेशक कीऔरऔर भी

आलोचनाएं बहुत हो रही हैं। पूरा हिसाब लगाकर बताया जा रहा है कि सरकार 2025 या 2026 में भी भारत को पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था नहीं बना पाएगी। सवाल उठाया जा रहा है कि 2047 तक भारत को विकसित देश बनाना महज राजनीतिक जुमला तो नहीं। लेकिन सरकार मदमस्त हाथी की तरह सारी आलोचनाओं की परवाह किए बिना दावे करती जा रही है। इस बीच मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के अंतिम बजट की तैयारियां पूरीऔरऔर भी