झूठ और प्रपंच की नई मिसाल है बजट!
बजट में एक तरफ वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने दावा किया कि उनकी सरकार ने एक दशक तक चले सतत व सुधार-उन्मुख प्रयासों से लगभग 25 करोड़ लोगों को बहु-आयामी गरीबी से बाहर निकाल लिया। दूसरी तरफ देश के 81.35 करोड़ गरीबों को महीने में पांच किलो मुफ्त राशन देने की प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के लिए बजट प्रावधान ₹2.03 लाख करोड़ से बढ़ाकर ₹2.27 लाख करोड़ कर दिया गया। साथ ही उर्वर भूमि को जहरीली बनाऔरऔर भी
निवासियों के बाद नज़र अनिवासियों पर
नारों व घोषणाओं की विकट भूल-भुलैया में उलझे देशवासियों को बजट से ज्यादा नहीं तो थोड़े सार्थक समाधान की उम्मीद ज़रूर थी। लेकिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने नए वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में ऐसे समाधान पेश किए हैं, जिन पर केवल रोया सकता है। जैसे, देश से विदेशी निवेशकों का पलायन बड़ी समस्या है। इससे हमारा रुपया भी डॉलर के मुकाबले तलहटी पकड़ता जा रहा है, वो भी तब, जब डॉलर खुद दुनिया की प्रमुखऔरऔर भी
घाटे का क्या, घाटा तो संभल ही जाएगा!
बजट से उद्योगों से लेकर आम लोगों और शेयर बाज़ार तक को बड़ी उम्मीदें हैं। सबको रियायत या टैक्स में छूट की आस। हालांकि समस्याएं विकट हैं। मैन्यूफैक्चरिंग पस्त है। जीडीपी में जो 12-14% मैन्यूफैक्चरिंग है, उसका बड़ा हिस्सा चीन को आउटसोर्स कर दिया गया है। फिर भी बजट में मैन्यूफैक्चरिंग को बढ़ाने का शोर तो होगा ही। लेकिन हर स्तर पर फैले भ्रष्टाचार का जिक्र तक करना वित्त मंत्री उचित नहीं समझेंगी। उनके लिए तो हरऔरऔर भी
एक तो मंदा धंधा, ऊपर से बाज़ार महंगा
हमारे शेयर बाज़ार में म्यूचुअल फंडों में एसआईपी के नियमित प्रवाह से देशी वित्तीय संस्थाओ का दम भले ही बढ़ गया हो, लेकिन इसकी दशा-दिशा तय करने में अब भी विदेशी पूंजी का अहम रोल है। इस विदेशी पूंजी का प्रोफाइल साल 2017 में भारत-मॉरीशस टैक्स संधि में संशोधन और सेबी के कड़े नियमों के बाद काफी बदल गया है। 2015 तक भारत में आ रहे विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) में मॉरीशस के पते वाली फर्मों काऔरऔर भी
डरी सरकार फेंके लाखों करोड़ सब्सिडी
मोदी सरकार एक डरी हुई सरकार है। यह येनकेन प्रकारेण ऊपर से लेकर नीचे तक सत्ता के समूचे तंत्र पर कब्जा करना चाहती है। इसलिए नहीं कि इसे देश का विकास करना है, बल्कि इसलिए कि इसे अपने यारों का भला और जनधन की अबाध लूट से अपनी पार्टी व संघी तंत्र का खजाना भरते रहना है। हर खास-ओ-आम को फिर भी उम्मीद है कि सरकार बजट में आर्थिक विकास, रोज़गार सृजन और उपभोक्ता मांग बढ़ाने केऔरऔर भी





