नारों व घोषणाओं की विकट भूल-भुलैया में उलझे देशवासियों को बजट से ज्यादा नहीं तो थोड़े सार्थक समाधान की उम्मीद ज़रूर थी। लेकिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने नए वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में ऐसे समाधान पेश किए हैं, जिन पर केवल रोया सकता है। जैसे, देश से विदेशी निवेशकों का पलायन बड़ी समस्या है। इससे हमारा रुपया भी डॉलर के मुकाबले तलहटी पकड़ता जा रहा है, वो भी तब, जब डॉलर खुद दुनिया की प्रमुखऔरऔर भी

बजट से उद्योगों से लेकर आम लोगों और शेयर बाज़ार तक को बड़ी उम्मीदें हैं। सबको रियायत या टैक्स में छूट की आस। हालांकि समस्याएं विकट हैं। मैन्यूफैक्चरिंग पस्त है। जीडीपी में जो 12-14% मैन्यूफैक्चरिंग है, उसका बड़ा हिस्सा चीन को आउटसोर्स कर दिया गया है। फिर भी बजट में मैन्यूफैक्चरिंग को बढ़ाने का शोर तो होगा ही। लेकिन हर स्तर पर फैले भ्रष्टाचार का जिक्र तक करना वित्त मंत्री उचित नहीं समझेंगी। उनके लिए तो हरऔरऔर भी

हमारे शेयर बाज़ार में म्यूचुअल फंडों में एसआईपी के नियमित प्रवाह से देशी वित्तीय संस्थाओ का दम भले ही बढ़ गया हो, लेकिन इसकी दशा-दिशा तय करने में अब भी विदेशी पूंजी का अहम रोल है। इस विदेशी पूंजी का प्रोफाइल साल 2017 में भारत-मॉरीशस टैक्स संधि में संशोधन और सेबी के कड़े नियमों के बाद काफी बदल गया है। 2015 तक भारत में आ रहे विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) में मॉरीशस के पते वाली फर्मों काऔरऔर भी

मोदी सरकार एक डरी हुई सरकार है। यह येनकेन प्रकारेण ऊपर से लेकर नीचे तक सत्ता के समूचे तंत्र पर कब्जा करना चाहती है। इसलिए नहीं कि इसे देश का विकास करना है, बल्कि इसलिए कि इसे अपने यारों का भला और जनधन की अबाध लूट से अपनी पार्टी व संघी तंत्र का खजाना भरते रहना है। हर खास-ओ-आम को फिर भी उम्मीद है कि सरकार बजट में आर्थिक विकास, रोज़गार सृजन और उपभोक्ता मांग बढ़ाने केऔरऔर भी

भारत का ऋण-जीडीपी अनुपात अपने-आप में ज्यादा नहीं कहा जा सकता। ब्रिक्स के मूल पांच देशों में रूस (24.8%) व दक्षिण अफ्रीका (79.5%) को छोड़ दें तो ब्राज़ील (95%) और चीन (102.3%) का ऋण-जीडीपी अनुपात हमसे ज्यादा है। विकसित देशों में अमेरिका का यह अनुपात 128.7%, ब्रिटेन का 104.8%, फ्रांस का 119.6% और जापान का 226.8% है, जबकि जर्मनी का यह अनुपात 66% है। पाकिस्तान का तो ऋण-जीडीपी अनुपात हमसे कम 71.3% है। असल दिक्कत यह हैऔरऔर भी