चीन ही नहीं, दुनिया का कोई भी देश भारत के मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में निवेश करने को तैयार नहीं है। इसके बाहरी और आंतरिक दोनों ही कारण है। सरकार को लगता है कि टैक्स में रियायत देकर विदेशी निवेश खींचा जा सकता है। लेकिन ईडी और सीबीआई के जरिए जिस तरह कंपनियों को परेशान करके वसूली की जाती है, वो सारी दुनिया को पता लग चुका है तो कोई भी कंपनी लफड़े में नहीं पड़ना चाहती। हां, चीनऔरऔर भी

यह कैसा स्वदेशी और आत्मनिर्भर भारत है कि हमें 30.8% औद्योगिक माल चीन से आयात करना पड़ रहा है। भारत हर साल चीन से 50 अरब डॉलर के इलेक्ट्रॉनिक्स व इलेक्ट्रिक उपकरण, 27 अरब डॉलर की मशीनरी और 13 अरब डॉलर के कार्बनिक रसायन, प्लास्टिक व स्टील मेडिकल उपकरण जैसे उत्पाद आयात करता हैं। ये ऐसे आवश्यक उत्पाद हैं जिनके बिना भारतीय अर्थव्यवस्था चल नहीं पाएगी। दुनिया में इनके वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध हैं, लेकिन काफी महंगे। ऊपरऔरऔर भी

भारत का व्यापक जनमत चीन के खिलाफ है। फिर भी मोदी सरकार ने इसकी कोई परवाह न करते हुए 10 मार्च को सीमा से सटे देशों से आनेवाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के नियमों में ढील दे दी। बता दें कि इसी सरकार ने अप्रैल 2020 में जारी प्रेसनोट-3 के तहत चीन द्वारा मौका ताड़कर भारतीय कंपनियों के अधिग्रहण को रोकने के लिए कठोर नियम बनाए थे। अब चीन की कंपनियों को भारतीय कंपनियों में 10% तकऔरऔर भी

जो दिख रहा है और सरकारी विज्ञापनों में खूब दिखाया जा रहा है, वो विकास है। जो नहीं दिख रहा है, मीडिया के शोर में छिपाया जा रहा है, वो विनाश है। देश की मानव संपदा और प्राकृतिक संपदा का विनाश। भारतवर्ष, जो महज एक देश ही नहीं, पूरी सभ्यता है, वो विपुल संभावनाओं वाला राष्ट्र आज अंदर ही अंदर विखण्डित व खोखला होता जा रहा है। करीब 20 दिन पहले एक इंक निर्माता कंपनी के अधिकारीऔरऔर भी