नए साल के बजट की बेला आ चुकी है। ऐसे में जानना ज़रूरी है कि ऊपर-ऊपर भले ही देश पहली तिमाही में जीडीपी 7.8%, दूसरी तिमाही में 8.2% और पूरे वित्त वर्ष में 7.4% की विकास दर के साथ उछलता दिख रहा हो, लेकिन सतह के नीचे तैरती और बढ़ती पस्ती गहराने लगी है। इसका सबसे बड़ा आभास देश में सरकारी ऋण और जीडीपी के बढ़ते अनुपात से मिलता है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण कहती रही हैंऔरऔर भी

इस समय दुनिया में भारत की स्थिति गांव में गरीब की लुगाई जैसी हो गई है जिसे हर कोई मजे में छेड़कर चला जाता है। ट्रम्प ने पहले 25% के ऊपर 25% और टैरिफ लगाकर अपनी शर्तें मनवा ली। अब 25% अतिरिक्त टैरिफ हट भी गया तो अमेरिका 25% तो लगाएगा ही। यूरोपीय संघ दूसरे तरीके से मजे ले रहा है। एक तरफ यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला फॉन डेर लायन कहती हैं कि यूरोपीय संघ भारतऔरऔर भी

आज के हालात में भारत में कमाना बड़ी-बड़ी कंपनियों के लिए भी मुश्किल हो गया है। दिसंबर तिमाही के ताज़ा वित्तीय नतीजे पस्ती की हालत का दस्तावेज़ बन गए हैं। जिन आईटी कंपनियों का दायरा विदेश तक फैला हुआ है, उन तक के नतीजे उम्मीद से खराब रहे हैं। इनमें टीसीएस, इन्फोसिस, एचसीएल टेक, विप्रो, टेक महिंद्रा और एलटीआई माइंडट्री शामिल हैं। रिलायंस इंडस्ट्रीज़ और आईसीआईसीआई बैंक तक ने निराश किया है। रिलायंस रिटेल का धंधा दबनेऔरऔर भी

चीन पर बढ़ती निर्भरता सुनियोजित लगती है। नवंबर 2016 में नोटबंदी से हमारे एमएसएमई क्षेत्र की कमर तोड़ दी गई। जुलाई 2017 में जीएसटी आया तो छोटी व मध्यम औद्योगिक इकाइयों पर दूसरा सरकारी हमला हुआ। फिर मार्च 2020 में कोरोना महामारी में गलत लॉकडाउन के फैसले ने हज़ारों लघु इकाइयों पर ताला लगवा दिया। यह सब करते हुए सरकार मगन थी कि वह अर्थव्यवस्था का इनफॉर्मल स्वरूप खत्म कर उसे फॉर्मल बना रही है, सारी औद्योगिकऔरऔर भी