भारत को अगर अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस व जापान जैसा विकसित देश बनना है या चीन, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका व इंडोनेशिया जैसा उच्च मध्यम आय का देश भी बनना है तो मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र को बढ़ाना होगा। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 साल पहले 2015 में कहा था कि 2025 तक जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग का हिस्सा 25% पर पहुंचा देंगे। हकीकत यह है कि यह 2011-12 में जीडीपी का 17.4% हुआ करता था। 2024-25 में घटते-घटते 13.9% परऔरऔर भी

भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। पिछले दस सालों में देश का जीडीपी मार्च 2016 के ₹135.76 लाख करोड़ से 2.63 गुना होकर मार्च 2026 तक ₹357.14 करोड़ पर पहुंचने जा रहा है। जाहिर है कि देश की धन-दौलत भी बढ़ी है। लेकिन यह धन-दौलत जा कहां रही है? किसानों की आय तो दोगुना हुई नहीं! इनकम टैक्स विभाग के आंकड़ों के मुताबिक पिछले दस सालों में मध्यम वर्ग की औसत कमाई ₹10.23 लाखऔरऔर भी

आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि भारत विपुल प्राकृतिक संपदा और मानव संसाधनों के बावजूद चीन से ललकार कर बात नहीं कर पा रहा? असल में यह भारत की नहीं, देश की सत्ता पर बारह साल से कुंडली मारे बैठी मोदी सरकार की मजबूरी है। जिस तरह मोदी सरकार ट्रम्प को दो-टूक जवाब इसलिए नहीं दे पा रही क्योंकि न्यूयॉर्क की अदालत ने घूसखोसी के मामले में अडाणी की पूंछ दबा रखी है, उसी तरह अडाणी केऔरऔर भी

डोनाल्ड ट्रम्प ने मागा (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) का नाम लेकर टैरिफ-टैरिफ की चिल्ल-पों और अपने दूसरे कर्मों से अमेरिका को बर्बादी की ढलान पर डाल दिया है। वहीं, चीन अपनी मैन्यूफैक्चरिंग के दम पर विश्व विजय के अभियान पर निकल पड़ा है। उसने कनाडा से आयात होनेवाले कैनेला के बीजों पर टैरिफ 84% से घटाकर 15% करने के बदले वहां निर्यात की जानेवाली इलेक्ट्रिक कारों पर टैरिफ 100% से घटवा कर मात्र 6.1% करा लिया। चीनऔरऔर भी

हमारे शेयर बाज़ार का मूल्यांकन बहुत चढ़ा हुआ है। दुनिया में अमेरिका को छोड़ दें तो चीन व हांगकांग से लेकर यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया व ब्राज़ील तक के बाज़ार पी/ई अनुपात के पैमाने पर भारत से बहुत सस्ते हैं। क्या यह विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के भारत से पलायन की प्रमुख वजह नहीं है? क्या आपको नहीं लगता कि भारतीय शेयर और वहां ट्रेड हो रही तमाम अच्छी कंपनियों के शेयरों का मूल्यांकन बहुत ज्यादा है? यहऔरऔर भी