साल 2013 में जब आईएमएफ ने भारत, इंडोनेशिया, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका और तुर्किए को दुनिया की पांच फ्रेज़ाइल या भंगुर अर्थव्यवस्थाएं कहा था, तब जनवरी से सितंबर के बीच डॉलर के सापेक्ष भारतीय रुपया 12%, इंडोनेशिया का रुपैया 15.4%, दक्षिण अफ्रीका का रैंड 14.4%, तुर्किए का लीरा 9.9% और ब्राज़ील का रियाल 7.6% गिरा है। वहीं, इस बार पिछले 12 महीनों में डॉलर के मुकाबले रुपया 12.09%, तुर्किए का लीरा 17.17% और इंडोनेशिया का रुपैया 4.33% कमज़ोरऔरऔर भी

अर्थव्यवस्था संसद या विधानसभा का चुनाव नहीं, जिसे तंत्र की ताकत और जोड़-तोड़ से जीत लिया जाए। न ही यह किसी जादूगर का सम्मोहन है जिसमें सारी भीड़ को एक साथ मदमस्त कर नचा लिया जाए। लेकिन मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन को लगता है कि उनके पास ऐसी सम्मोहनी शक्ति है जिससे वे भारतीय अवाम की आंखों में धूल झोंक सकते हैं। उन्होंने पिछले ही हफ्ते आईआईटी मद्रास में इंजीनियरिंग के छात्रोंऔरऔर भी

अर्थव्यवस्था का पचका हो जाए तो देश का आम जनजीवन और रोज़ी-रोज़गार थरथरा जाता है। सात साल से यही हो रहा है। वित्त वर्ष 2018-19 से 2025-26 तक के सात सालों में हमारा रीयल जीडीपी मात्र 5.4% की सालाना चक्रवृद्धि दर (सीएजीआर) से बढ़ा है। 2013-14 से 2025-26 तक के 12 साल के मोदीकाल में भी यह दर 6.2% ही रही है। हालांकि सरकार कोरोना की डुबकी के बाद पिछले दो-तीन की विकास दर की चकाचौंध दिखानेऔरऔर भी

देश की अर्थव्यवस्था डूबती जा रही है। सरकार यह सच स्वीकार नहीं कर सकती क्योंकि ऐसा करने पर वो खुद डूब जाएगी। लेकिन रुपया रसातल में जा रहा है, यह हर खासो-आम खुली आंखों से देख रहा है। फरवरी अंत में ईरान पर अमेरिकी हमले के बाद रुपया 30 मार्च को डॉलर के मुकाबले 95.22 तक चला गया था। महीने भर बाद 30 अप्रैल को इसने 95.35 की नई तहलटी पकड़ ली। कच्चा तेल 110 डॉलर प्रतिऔरऔर भी

भारतीय शेयर बाज़ार इस समय संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। पिछले कुछ सालों का आशावाद ज़मीनी हकीकत से टकराकर निराशा में बदलने लगा है। कंपनियों की लाभप्रदता दबाव में है। सप्लाई में बाधा आने और दुनिया में छाए युद्ध की तनातनी में कच्चे माल व ऊर्जा के दाम बढ़ गए हैं। उपभोक्ता मांग ठंडी पड़ी है तो कंपनियां बढ़ी लागत ग्राहकों पर डालने में हिचकिचा रही हैं। उनका मूल्यांकन ठहरा पड़ा है। पहले विदेशी निवेशकऔरऔर भी