नए वित्त वर्ष 2024-25 का आगाज़। नए हफ्ते का पहला दिन। ऐसा संयोग कभी-कभी ही मिलता है। हमें इसे अप्रैल-फूल के चक्कर में व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए, बल्कि सत्य के सफर का प्रस्थान बिंदु बना लेना चाहिए। हम महज शेयर बाज़ार के निवेशक या ट्रेडर ही नहीं, बल्कि अपनी अर्थव्यवस्था के सबसे प्रतिबद्ध प्रेक्षक भी हैं। कारण, निवेशक व ट्रेडर के रूप में हमारा पूरा वजूद ही अर्थव्यवस्था के हाल पर टिका हुआ है। इसलिए सारे हाइपऔरऔर भी

सेंसेक्स व निफ्टी ही नहीं, स्मॉल-कैप व मिड-कैप सूचकांकों की चाल देखकर हम अक्सर मगन हो जाते हैं कि वाह! शेयर बाज़ार में क्या तेज़ी चल रही है। आकार और उद्योग व सेवा क्षेत्र पर आधारित ऐसे 15-15 सूचकांक अलग से हैं जिनकी धड़कनों से बाज़ार का ताज़ा हाल जाना जा सकता है। लेकिन इतना ज्ञान बिजनेस चैनलों व सोशल मीडिया के सतही एनालिस्टों के लिए काफी हो सकता है, शेयर बाज़ार में गहरी पैठ की चाहऔरऔर भी

मोदी सरकार की नीतियों और नीयत को परखने के बाद विशेषज्ञ विदेशी निवेशकों को यही सलाह दे रहे हैं कि आप भारतीय शेयर बाज़ार से कमाने के लिए थोड़े समय का निवेश ज़रूर करते रहें, लेकिन खुद उद्योग-धंधों में पूंजी लगाने का जोखिम न उठाएं। कारण, मोदी सरकार अपने मुठ्ठी भर चहेतों का हित साधने के लिए कभी भी उनके धंधे पर लात मार सकती है। साथ ही वे अभी शेयर बाज़ार के निवेश को लेकर भीऔरऔर भी

देश में होनेवाले विदेशी निवेश की आशावादी घोषणाओं में कोई कमी नही है। लेकिन वास्तविक निवेश छिटकता जा रहा है। मसलन, जुलाई 2023 में ताइवान के फॉक्सकॉन ग्रुप ने वेदांता समूह के साथ लगाए जानेवाले 19.5 अरब डॉलर के सेमी-कंडक्टर संयुक्त उद्यम से हाथ पीछे खींच लिया। अभी पिछले ही महीने फरवरी में सोनी ने ज़ी एंटरटेनमेंट के साथ विलय का 10 अरब डॉलर का करार तोड़ दिया। वित्त वर्ष 2023-24 की पहली छमाही में देश मेंऔरऔर भी