कैसी भागमभाग!
सारी दुनिया दौलत के पीछे भाग रही है। काम, काम, काम। भागमभाग। लगे रहो ताकि धन बराबर आता रहे। लेकिन इससे कहीं ज्यादा अहम है इसकी चिंता करना कि हम अपने घर-परिवार के साथ ज्यादा भावपूर्ण रागात्मक ज़िंदगी कैसे जी सकते हैं।और भीऔर भी
सारी दुनिया दौलत के पीछे भाग रही है। काम, काम, काम। भागमभाग। लगे रहो ताकि धन बराबर आता रहे। लेकिन इससे कहीं ज्यादा अहम है इसकी चिंता करना कि हम अपने घर-परिवार के साथ ज्यादा भावपूर्ण रागात्मक ज़िंदगी कैसे जी सकते हैं।और भीऔर भी
किसी के बिना किसी का भी काम नहीं रुकता। सबकी अपेक्षाकृत स्वतंत्र ज़िंदगी है, हिचकोले खा पटरी पर आ जाती है। ऐसे में किसी को जोड़ने का सही तरीका उसे जबरन खीचना नहीं, बल्कि वो जहां है, वहीं उसकी ज़िंदगी को और चमकाने का सूत्र दे देना है।और भीऔर भी
ज़िंदगी का असली मूल्य महज गणनाओं में नहीं, बल्कि यह जानने व पता लगाने में है कि असली चीजें क्या हैं और कैसे काम करती हैं। दुनिया हमें धकेलती है हिसाब-किताब लगाने की तरफ। लेकिन असली चीजें हिसाब-किताब से बहुत परे होती हैं, बंधु!और भीऔर भी
इंसानों की इस दुनिया में भगवान की तलाश बड़ी रिस्की है। न जाने किस भेष में भगवान नहीं, कोई शैतान या महाठग मिल जाए! फिर, जब सब कुछ अपने ज्ञान, कर्म और नेटवर्किंग से मिलना है तो ऐसा संगीन रिस्क उठाने में फायदा ही क्या। और भीऔर भी
कल जो हुआ, सो हुआ। कल क्या होगा, चिंता इसकी है। कारण, करने व सोचने का तरीका एकदम सही होने के बावजूद हम गलत साबित हो सकते हैं क्योंकि हम अतीत को नहीं, बल्कि भविष्य को साध रहे होते हैं और भविष्य में हमेशा रिस्क होता है।और भीऔर भी
जब तक नौकरी का दबाव, तब तक अपने काम का समय नहीं। जब नौकरी से मुक्त होकर अपने काम की फुरसत, तब नौकरी की नियमित आय के रुक जाने से उपजी असुरक्षा और घबराहट। मतलब, काम तो दबाव के बीच ही हो सकता है।और भीऔर भी
ये कैसा लोकतंत्र है जहां हम हर पांच साल पर सुशासन नहीं, कुशासन के लिए अपने राजनीतिक प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं? ये कैसा जनतंत्र है जहां हमें अपनी बुद्धि व समझ से नहीं, बॉस के आदेश के हिसाब से काम करना पड़ता है?और भीऔर भी
सकल पदारथ है जगमाँही, कर्महीन नर पावत नाहीं। लेकिन कर्म से पहले यह तो पता होना चाहिए कि आखिर हमें चाहिए क्या। इसके लिए ज्ञान जरूरी है। ज्ञान से हमारी दुनिया खुलकर व्यापक हो जाती है और हम सही चयन कर पाते हैं।और भीऔर भी
मुझे पता है कि मुठ्ठी भर लोगों को छोड़ दें तो इससे आप पर कोई फर्क नहीं प़ड़ता। आपके आगे रोने का भी कोई फायदा नहीं। आप मजे से तमाशा देखते रहेंगे। लेकिन मेरे लिए तो यह वजूद और निष्ठा का सवाल था। अब तो यही लगता है कि इतनी मशक्कत के बाद भी यहां से इतना नहीं मिलनेवाला जिससे अपना और अपने घर का गुजारा चल जाए तो अर्थकाम नाम के खटराम को क्यों चलाया जाए?औरऔर भी
फरवरी सेटलमेंट में बाजार बराबर बढ़ता रहा, जबकि पेट्रोल व डीजल की मूल्यवृद्धि और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों की चिंता से हर कोई वाकिफ था। ट्रेडर निफ्टी के 5200 से 5600 तक पहुंचने तक लगातार शॉर्ट करते रहे। फिर आखिरकार उन्होंने हथियार डाल दिया और बाजार धड़ाम हो गया। लगातार चार दिनों तक बाजार गिरता रहा। कल की गिरावट पिछले छह महीनों की सबसे तगड़ी गिरावट थी। इसने न केवल सारे लांग सौदों पर पूर्णविराम लगाऔरऔर भी
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