कृषि ने हर संकट में देश को बचाया है। कोरोनाकाल में जब अर्थव्यवस्था बढ़ने के बजाय 6.6% घट गई थी, तब कृषि ने अपनी 3.3% विकास दर से जीडीपी को ज्यादा डूबने से बचा लिया था। लेकिन पिछले छह सालों में हमारी कृषि की विकास दर कभी भी 5% से ऊपर नहीं गई। खुद सरकारी आंकड़ों की बात करें तो वित्त वर्ष 2018-19 में यह 2.4%, वित्त वर्ष 2019-20 में 4%, कोरोनाकाल में वित्त वर्ष 2020-21 मेंऔरऔर भी

इस समय राजधानी दिल्ली में दुनिया भर के कृषि अर्थशास्त्रियों का सम्मेलन चल रहा है। शुक्रवार, 2 अगस्त से शुरू हुआ यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन बुधवार, 7 अगस्त तक चलेगा। यह सम्मेलन इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ एग्रीकल्चरल इकनॉमिस्ट्स की तरफ से हर तीन साल पर आयोजित किया जाता है। उसका यह 32वां सम्मेलन भारत में 65 साल बाद हो रहा है। इसमें दुनिया के 75 देशों के लगभग एक हज़ार प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं। भारत के लिए यहऔरऔर भी

निफ्टी-50 सूचकांक दो दिन पहले पहली बार 25,000 अंक के पार चला गया। क्या इसका वास्ता जीडीपी के बढ़ते आंकड़ों से है? हो सकता है। लेकिन इसका बड़ा वास्ता बाज़ार में सट्टेबाज़ी की नीयत से आए धन के भारी प्रवाह से भी है। कारण, जीडीपी के बढ़ते आंकडों के पीछे छिपी हकीकत यह है कि आमजन की खपत पर टिकी कंपनियों का धंधा ठहरा पड़ा है। जीडीपी की चमक ऐसी कंपनियों के लिए फीकी है। सरकारी कृपा,औरऔर भी

दावा कुछ और, ज़मीनी सच्चाई कुछ और। आंकड़ों की रंग-बिरंगी चादर लहराकर बदरंग हकीकत को ढंका जा रहा है। सवाल उठा कि 2023-24 में हमारा जीडीपी सचमुच 8.2% बढ़ा है तो रोज़ी-रोज़गार क्यों नहीं बढ़ा? रिजर्व बैंक ने फौरन रिपोर्ट निकाल दी कि बीते साल रोज़गार में 4.67 करोड़ का रिकॉर्ड इज़ाफा हुआ है। अब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण एसबीआई रिसर्च रिपोर्ट का हवाला देते हुए कह रही हैं कि 2014 से 2023 के दौरान देश मेंऔरऔर भी

देशी-विदेशी कॉरपोरेट क्षेत्र का एक ही सूत्र और मंत्र है अपना मुनाफा अधिकतम करते जाना। इसी पर उनका समूचा वजूद टिका है। मुनाफा घटता जाए तो वे एक दिन हाथ खड़ाकर दीवालिया हो जाते हैं। फिर भी वित्त मंत्री उन पर कृपा बरसाने से बाज़ नहीं आ रहीं। साथ ही देश को झांसा देती जा रही हैं कि देशी-विदेशी कंपनियों पर जितनी कृपा बरसेगी, वे उतना ही निवेश करेंगी और रोज़गार के नए अवसर पैदा होंगे। लेकिनऔरऔर भी

करोडों बेरोजगारों के लिए रोज़ी-रोज़गार के अवसर और रोज़ी-रोज़गार में लगे लोगों की आय व बचत को बढ़ाना। यही हमारी अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती है। इसे सुलझाने से ही देश में मांग या खपत बढ़ेगी, जिससे निजी क्षेत्र नया पूंजी निवेश करेगा। लेकिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को लगता है कि स्टैंडर्ड डिडक्शन ₹50,000 से बढ़ाकर ₹75,000 कर देने और टैक्स-स्लैब में मामूली फेरबदल कर देने से अर्थव्यवस्था में मांग बढ़ जाएगी। इससे 15 लाख सेऔरऔर भी

जो जितना कमजोर, उससे उतना ही ज्यादा टैक्स। आप जानकर चौंक जाएंगे कि दिल्ली के ओल्ड राजिंदर नगर के जिस कोचिंग सेंटर में सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहे तीन छात्रों की मौत हो गई, उसके बारे में केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय के पास कोई जानकारी नहीं है। राज्यसभा में ओल्ड राजिंदर नगर के हादसे तो मुद्दा उठा तो सरकार के पास केवल जीएसटी वसूली के अलावा कोई जवाब नहीं था। शिक्षा मंत्रालय को बस इतनाऔरऔर भी

अपने यहां टैक्सों की विचित्र स्थिति है। सालाना करोड़ों में कमा रहा कॉरपोरेट क्षेत्र कुछ लाख कमानेवाले लोगों से कम टैक्स देता है और किसी तरह गुजारा कर रहे देश के आमजन जीएसटी, एक्साइज़ व कस्टम शुल्क के रूप में सबसे ज्यादा टैक्स देते हैं। बजट के मुताबिक सरकार को चालू वित्त वर्ष 2024-25 में कॉरपोरेट टैक्स से ₹10.20 लाख करोड़ मिलने हैं, जबकि इनकम टैक्स से मिलनेवाली रकम इससे अधिक ₹11.87 लाख करोड़ रहेगी। वहीं, आमजनऔरऔर भी

अफसोस की बात है कि अपने यहां 2.5 लाख रुपए की इनकम टैक्स मुक्त सीमा 2014-15 से जस की तस चली आ रही है, जबकि तब से अब तक दस साल में मुद्रास्फीति की औसत दर 5.50% रही है। इस हिसाब से तब के 2.5 लाख रुपए आज के 4.27 लाख रुपए हो चुके हैं। लेकिन सरकार के लिए धन के समय मूल्य या टाइम वैल्यू ऑफ मनी का कोई मतलब नहीं। वो महंगाई को डिस्काउंट किएऔरऔर भी

बजट को तीन अहम काम करने थे। निजी निवेश बढ़ाने के इंतज़ाम, रोज़गार के अवसर और आम खपत को बढ़ाना। लेकिन खपत बढ़ाने के लिए इनकम टैक्स छूट की सीमा बढ़ाने के बजाय कैपिटल गेन्स टैक्स और एसटीटी बढ़ा दिया। संगठित क्षेत्र में नई नौकरी पानेवाले को पहले महीने ₹15,000 देने और कर्मचारियों को दो साल तक ईपीएफओ में ₹3000 रुपए तक के मासिक योगदान के रीइम्बर्समेंट से नई नौकरियां कैसे पैदा हो सकती हैं? दावा किऔरऔर भी