थोड़े दिनों की विपत्ति सामान्य दिनों से कहीं ज्यादा सिखाकर चली जाती है। कोरोना संकटकाल में शेयर बाज़ार ने भी हमें बहुत सारी सीख दी है। जैसे, खराब माहौल में मजूबत कंपनियों के शेयर गिरें तो उन्हें बेहिचक खरीद लें। रिलायंस 23 मार्च को 866.98 तक गिर गया था। लेकिन ढाई महीने बाद 8 जून को वही शेयर 1618.40 तक चढ़ गया। 86.67% का जबरदस्त रिटर्न। हालांकि उसके बाद 5.09% उतरा है। अब बुध की बुद्धि…और भीऔर भी

फाइनेंस की दुनिया वास्तविक दुनिया से बहुत अलग होती है। नहीं तो ऐसा कैसे होता कि जिन दिनों देश में कोरोना का कहर था, संक्रमण बढ़ रहा था, उसी दौरान रिलायंस ने जियो प्लेटफॉर्म्स के लिए फेसबुक, सिल्वर लेक, विस्टा इक्विटी पार्टनर्स, जनरल अटलांटिक, के के आर, अबूधाबी इन्वेस्टमेट अथॉरिटी व मुबाडाला जैसे नामी निवेशकों से 97,886 करोड़ रुपए जुटा लिए। राइट्स इश्यू से जुटाए गए 53,124 करोड़ रुपए अलग से हैं। अब मंगल की दृष्टि…और भीऔर भी

हिंदी के मशहूर जनकवि बाबा नागार्जुन की कविता हैं, “बहुत दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास। बहुत दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास। बहुत दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त, बहुत दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त। दाने आए घर के अंदर बहुत दिनों के बाद, धुआं उठा आंगन से ऊपर बहुत दिनों के बाद।” 75 दिन खिंचा लॉकडाउन बीतने पर ऐसा ही कुछ लगता है। अब सोमवार का व्योम…और भीऔर भी

जिसने दस साल पहले रिटायरमेंट का प्लान बनाकर सीधे स्टॉक्स और इक्विटी म्यूचुअल फंड स्कीमों में निवेश किया होगा, वह आज कोरोना के झटके से थोड़ा उबरने के बावजूद रो रहा होगा क्योंकि इस दौरान उसके दस लाख रुपए बीस लाख भी नहीं हुए होंगे और बमुश्किल 7% चक्रवृद्धि रिटर्न मिला होगा। इसलिए हमें ऐसी आकस्मिकताओं पर पहले से सोचकर निवेश करना चाहिए। आज तथास्तु में एक ऐसी कंपनी जो इस तरह की आपदाओं से ऊपर है…औरऔर भी

डिफेंस जैसे संवेदनशील क्षेत्र में विदेशी कंपनियों कों 74% मालिकाना देकर भारत को आत्मनिर्भर बनाने का दावा करना मात्र एक सब्ज़बाग है। भारत को अपने प्राकृतिक, मानव व ऐतिहासिक संसाधनों के अधिकतम इस्तेमाल और घरों के सोने व मंदिरों की अकूत संपदा में फंसी अनुत्पादक पूंजी को निकालकर ही आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। भारत में ज़मीन से उठे ब्रांडों को भी उभारना पड़ेगा। आज तथास्तु में पेश है एक ऐसे ही मजबूत ब्रांड से जुड़ी कंपनी…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में लिस्टेड अधिकांश कंपनियों के लिए 23 और 24 मार्च 2020 यादगार तारीख बन गई है क्योंकि कोरोना के कहर के बीच उस दिन उनके शेयरों ने ऐतिहासिक तलहटी पकड़ ली थी। लेकिन बहुतेरी कंपनियां इस कहर से अछूती रहीं जिनमें से ज्यादातर नेस्ले व हिंदुस्तान यूनिलीवर जैसी बहुराष्ट्रीय एफएमसीजी कंपनियां हैं। हालांकि कुछ देशी कंपनियां भी इस मार से बची रहीं। तथास्तु में पेश है आज नामी ब्रांड वाली ऐसी ही एक देशी कंपनी…औरऔर भी

लॉकडाउन के बावजूद कोरोना का प्रकोप बढ़ता जा रहा है। अपने यहां कोरोना के मरीजों की संख्या चीन से ज्यादा हो चुकी है। 20 लाख करोड़ रुपए का आर्थिक पैकेज फिलहाल खोखला दिख रहा है। ऐसे में वही कंपनियां मैदान में डटी रह सकती हैं जिनकी बैलेस शीट तगड़ी हो और जिनके उत्पाद व सेवाओं में इतना दम हो कि वे कोरोना की मार के बावजूद अपना बाज़ार बढ़ा सकें। तथास्तु में आज ऐसी ही एक कंपनी…औरऔर भी

अमेरिका में बेरोजगारी 1929 की महामंदी के बाद सबसे बदतर अवस्था में है। चीन पहले से त्रस्त है। भारत की विकास दर का अनुमान मूडीज़ ने शून्य कर दिया है। कुछ अर्थशास्त्री तो इसके ऋणात्मक होने की गणना कर रहे हैं। शेयर बाज़ार से निवेशक दूर भाग रहे हैं। अप्रैल में इक्विटी म्यूचुअल फंड स्कीमों में निवेश 47% घट गया है। ऐसे में भागना उचित है या डटे रहना। तथास्तु में इसका जवाब एक कंपनी के साथ…औरऔर भी

हमने बायनॉमिअल प्राइसिंग मॉडल में बैंकवर्ड इंडक्शन करते हुए ऑप्शन का भाव पोर्टफोलियो के मिलान या रेप्लिकेशन से निकाला। हमने यह भी देखा कि गिनने में यह तरीका ज्यादा ही जटिल है। मात्र दो ही चरणों में बहुत सारी गणनाएं करनी पड़ीं। इसकी तुलना में रिस्क न्यूट्रल वैल्यूएशन इस मॉडल का काफी आसान तरीका है। इसमें गणना कई चरणों में नहीं करनी पड़ती। सब कुछ आसान व सहज है। वैसे, यह कैसे काम करता है और इसमेंऔरऔर भी

ऑप्शन प्राइसिंग के ब्लैक-शोल्स मॉडल की तह में जाने से पहले हम एक दूसरे प्राइसिंग मॉडल को जानने की कोशिश करते हैं जो बाद में ब्लैक-शोल्स मॉडल को ठीक से जानने में काम आ सकता है। यह है बायनोमिअल मॉडल। हम इसे यूरोपियन कॉल ऑप्शन पर लागू करके उसका भाव निकालेंगे। बाद में पुट ऑप्शन का भाव कॉल-पुट समता के आधार पर निकाल सकते हैं। याद रखें कि यूरोपियन ऑप्शन सौदे एक्सपायरी के वक्त ही काटे जाऔरऔर भी