आंखें और उजाला
भोर से पहले आंख बंदकर सोचते रहते हैं तो हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा नज़र आता है। आंखें खोलकर देखते हैं तो इस बीच हर तरफ उजाला आ चुका होता है। लेकिन प्रकृति का यह नियम क्या समाज पर भी लागू होता है?और भीऔर भी
भोर से पहले आंख बंदकर सोचते रहते हैं तो हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा नज़र आता है। आंखें खोलकर देखते हैं तो इस बीच हर तरफ उजाला आ चुका होता है। लेकिन प्रकृति का यह नियम क्या समाज पर भी लागू होता है?और भीऔर भी
सृजन व पीड़ा में अभिन्न रिश्ता है। प्रकृति ने तो सृजन की हर प्रक्रिया के साथ खुशी व उन्माद के ऐसे भाव जोड़ रखे हैं कि पीड़ा गौड़ हो जाती है। सामाजिक सृजन में इंसान को यह काम खुद करना पड़ता है।और भीऔर भी
अपने को जानने का मतलब है अपने शरीर, मन और इस दुनिया-जहान की संरचना को जानना, इनकी मूल प्रकृति व अंतर्संबंधों को समझना। आज आंखें मूंदकर अपने को जानने की कसरत बेमतलब है।और भीऔर भी
फूल तो गुलाब भी है और बेला भी। अलग हैं लेकिन एक भी। यह भिन्नता प्रकृति व समाज दोनों में अपरिहार्य है। जो इसे तोड़कर एकसार बनाना चाहते हैं, वे समाज ही नहीं, प्रकृति के भी अपराधी हैं।और भीऔर भी
अनुभूति पहले आती है। शब्द बाद में आते है। शब्दों के खो जाने के बाद भी अनुभूति बची रहती है क्योंकि वही मूल है, शब्द तो छाया हैं। दोनों में द्वंद्व है समाज और व्यक्ति का, इतिहास और वर्तमान का।और भीऔर भी
हर दिन देश-दुनिया व समाज में इतना कुछ घटित होता है कि उन्हें जानकर हम एक ही दिन में परम ज्ञानी बन सकते हैं। लेकिन नजर की सीमा और आत्मग्रस्तता के कारण हम बहुत कुछ देख ही नहीं पाते।और भीऔर भी
जिंदगी में तमाम छोटी-छोटी चीजों से हमारा सुख व दुख निर्धारित होता है। इनमें से कुछ का वास्ता हमारे व्यक्तित्व, परिवार व दोस्तों से होता है, जबकि बहुतों का वास्ता सरकार व समाज के तंत्र से होता है।और भीऔर भी
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