भोर से पहले आंख बंदकर सोचते रहते हैं तो हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा नज़र आता है। आंखें खोलकर देखते हैं तो इस बीच हर तरफ उजाला आ चुका होता है। लेकिन प्रकृति का यह नियम क्या समाज पर भी लागू होता है?और भीऔर भी

सभ्य से सभ्य समाज में भी इंसान के अंदर एक जानवर बैठा रहता है। जो रिवाज इस जानवर को हवा देते हैं, उन्हें बेरहमी से खत्म कर देने की जरूरत है। परंपरा के नाम उन्हें चलाते रहना हैवानियत है।और भीऔर भी

सृजन व पीड़ा में अभिन्न रिश्ता है। प्रकृति ने तो सृजन की हर प्रक्रिया के साथ खुशी व उन्माद के ऐसे भाव जोड़ रखे हैं कि पीड़ा गौड़ हो जाती है। सामाजिक सृजन में इंसान को यह काम खुद करना पड़ता है।और भीऔर भी

अपने को जानने का मतलब है अपने शरीर, मन और इस दुनिया-जहान की संरचना को जानना, इनकी मूल प्रकृति व अंतर्संबंधों को समझना। आज आंखें मूंदकर अपने को जानने की कसरत बेमतलब है।और भीऔर भी

परिवार के लिए आप यकीनन मूल्यवान हैं। लेकिन अपना सच्चा सामाजिक मूल्य समझना हो तो बस इतना सोचकर देखें कि आपके बिना यह दुनिया कैसे चलती है और आपके न होने से कितना फर्क पड़ेगा।और भीऔर भी

किसी की हारी-बीमारी या शारीरिक विकलांगता हम नहीं दूर कर सकते। लेकिन समाज की व्यवस्था को इतना न्यायसंगत जरूर बना सकते हैं कि हर किसी को उसका वाजिब हक मिले और लूटखसोट बंद हो।और भीऔर भी

फूल तो गुलाब भी है और बेला भी। अलग हैं लेकिन एक भी। यह भिन्नता प्रकृति व समाज दोनों में अपरिहार्य है। जो इसे तोड़कर एकसार बनाना चाहते हैं, वे समाज ही नहीं, प्रकृति के भी अपराधी हैं।और भीऔर भी

अनुभूति पहले आती है। शब्द बाद में आते है। शब्दों के खो जाने के बाद भी अनुभूति बची रहती है क्योंकि वही मूल है, शब्द तो छाया हैं। दोनों में द्वंद्व है समाज और व्यक्ति का, इतिहास और वर्तमान का।और भीऔर भी

हर दिन देश-दुनिया व समाज में इतना कुछ घटित होता है कि उन्हें जानकर हम एक ही दिन में परम ज्ञानी बन सकते हैं। लेकिन नजर की सीमा और आत्मग्रस्तता के कारण हम बहुत कुछ देख ही नहीं पाते।और भीऔर भी

जिंदगी में तमाम छोटी-छोटी चीजों से हमारा सुख व दुख निर्धारित होता है। इनमें से कुछ का वास्ता हमारे व्यक्तित्व, परिवार व दोस्तों से होता है, जबकि बहुतों का वास्ता सरकार व समाज के तंत्र से होता है।और भीऔर भी