शेयरों के डेरिवेटिव सौदों में फिजिकल सेटलमेंट की व्यवस्था अपनाने पर महीने भर के भीतर अंतिम फैसला हो जाएगा। यह कहना है पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी के चेयरमैन सीबी भावे। वे गुरुवार को नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) में सर्टिफिकेशन एक्जामिनेशन फॉर फाइनेंशियल एडवाइजर्स (सीएफए) के लांचिंग समारोह के दौरान मीडिया से बात कर रहे थे। उनका कहना था, “स्टॉक एक्सचेंजों के साथ तमाम मसलों पर विमर्श हो चुका है और महीने भर के भीतर अंतिम फैसलाऔरऔर भी

दो साल पुराने वैश्विक वित्तीय संकट के बाद बैंकिंग व फाइनेंस क्षेत्र के निवेश को सबसे ज्यादा जोखिम भरा माना जाने लगा है। लेकिन हमारे म्यूचुअल फंडों ने अपना सबसे ज्यादा निवेश इसी क्षेत्र की कंपनियों के शेयरों में कर रखा है। पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी को एम्फी (एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया) के मिली जानकारी के मुताबिक मई अंत तक  म्यूचुअल फंडों ने अपनी कुल आस्तियों का 14.14 फीसदी हिस्सा बैंकों और 5.01 फीसदीऔरऔर भी

अगर कोई शेयरधारक साल के बीच में अपना डीमैट एकाउंट किसी डिपॉजिटरी पार्टिसिपेंट (डीपी) के पास बंद कराके दूसरे डीपी के पास ले जाता है तो पहले डीपी को शेयरधारक से लिए गए सालाना या छमाही एकाउंट मेंटेनेंस चार्ज (एमएमसी) का बाकी तिमाही का हिस्सा लौटाना होगा। पूंजी बाजार नियामक सस्था, सेबी ने गुरुवार को एक सर्कुलर जारी कर यह निर्देश दिया है। अभी तक होता यह है कि डीपी साल या छमाही की शुरुआत में डीमैटऔरऔर भी

पूंजी बाजार नियामक संस्था, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने तय किया है कि विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) को शॉर्ट सेलिंग के लिए उधार दिए गए शेयरों की सूचना अब हर कारोबारी दिन के बजाय हफ्ते में केवल एक दिन शुक्रवार को देनी होगी। लेकिन अगर वे अगर अपने विदेशी क्लाएंट को पार्टिसिपेटरी नोट (पीएन) जारी करते हैं तो उन्हें इसकी सूचना तत्काल देनी होगी। सेबी ने एफआईआई और उनके सभी कस्टोडियन के नाम मंगलवार कोऔरऔर भी

म्यूचुअल फंड की किसी भी स्कीम में कम से कम 20 निवेशकों का होना जरूरी है और एक यूनिटधारक के पास स्कीम या प्लान के कुल आकार का 25 फीसदी से ज्यादा हिस्सा नहीं हो सकता। इन शर्तों के उल्लंघन पर पूरी स्कीम ही बंद ही जा सकती है और यूनिटधारकों को उनका पैसा उस समय के एनएवी (शुद्ध आस्ति मूल्य) के हिसाब से लौटा देना होगा। लेकिन एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) पर सेबी का यह नियमऔरऔर भी

सुना है कि म्यूचुअल फंड उद्योग में डिस्ट्रीब्यूशन मॉडल को नए सिरे से ढालने की बात चल रही है, लेकिन मुझे लगता है कि आज अहम जरूरत इस बात की है कि हम खुद से पूछें कि म्यूचुअल फंड उद्योग के बने रहने का ही क्या तुक है। हमें बराबर बताया जाता है कि म्यूचुअल फंड में प्रोफेशनल मैनेजर सबसे जुटाई गई बचत का कुशल प्रबंधन करते हैं और वे खुद अपना पैसा संभालनेवाले औसत निवेशक सेऔरऔर भी

पिछले साल अगस्त से ही म्यूचुअल फंड उद्योग को दुरुस्त करने और उसमें रिटेल निवेशकों की भागीदारी बढ़ाने की कोशिश में लगे सेबी चेयरमैन सी बी भावे ने लगता है हथियार डाल दिए हैं। बुधवार को मुंबई में उद्योग संगठन सीआईआई (कनफेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री) के म्यूचुअल फंड सम्मेलन में उन्होंने कहा कि म्यूचुअल फंड उद्योग को खुद ही एक आम नीति का प्रस्ताव पेश करना चाहिए कि इस उद्योग को कैसे संचालित किया जाए। सम्मेलन मेंऔरऔर भी

पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी 1 जुलाई 2010 से ऐसा नियम लागू करने जा रही थी, जिससे म्यूचुअल फंडों में कॉरपोरेट क्षेत्र का छोटी अवधि का भारी निवेश दूर भाग सकता था। लेकिन सेबी ने एक नया सर्कुलर जारी कर इस पर अमल की तारीख 1 अगस्त 2010 कर दी है। वैसे, साथ ही कहा कि जो म्यूचुअल फंड इसकी तैयारी कर चुके हों, वे इसे पहले भी लागू कर सकते हैं। असल में सेबी ने 2औरऔर भी

अपनी राजनीतिक पहुंच और शेयर बाजार के निवेश में बीमा कंपनियों की बड़ी अहमियत के कारण यूलिप पर नियंत्रण में सेबी को पछाड़ने के बाद बीमा नियामक संस्था, आईआरडीए (इरडा) बड़ी तेजी से यूलिप (यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस पॉलिसी) को दुरुस्त बनाने में लग गई है। सोमवार को इरडा के चेयरमैन जे हरिनारायण ने दिल्ली में एक समाचार एजेंसी से बातचीत में कहा कि जल्दी यूलिप के बारे में नए दिशानिर्देश जारी किए जाएंगे ताकि इसे पॉलिसीधारकों केऔरऔर भी

अब 8 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में यूलिप विवाद पर सुनवाई का कोई मतलब नहीं रह गया है क्योंकि सरकार ने इससे जुड़े चार के चार कानूनों – आरबीआई एक्ट 1934, इश्योरेंस एक्ट 1938, सेबी एक्ट 1992 और सिक्यूरिटीज कांटैक्ट रेगुलेशन एक्ट 1956 में संशोधन कर दिया है। शुक्रवार 18 जून को देर रात राष्ट्रपति की तरफ से इन संशोधनों को अध्यादेश के रूप में जारी करवा दिया गया है। जब तक संसद के दोनों सदन किसीऔरऔर भी