प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने स्पष्ट किया है कि सूचना अधिकार कानून में कोई ढील नहीं दी जाएगी। सरकार पारदर्शिता के लिए सूचना के अधिकार को और अधिक कारगर हथियार बनाना चाहती है लेकिन वह कुछ चिंताओं पर ध्यान देने के लिहाज से उसकी गहन समीक्षा भी करना चाहती है। गौरतलब है कि सरकारी महकमे के कुछ लोग और केंद्रीय मंत्री तक इस पारदर्शिता कानून में संशोधन की मांग करते आ रहे हैं। उनका मानना है कि यहऔरऔर भी

मद्रास हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है जिसमें सीबीआई को सूचना के अधिकार (आरटीआई) कानून के दायरे से बाहर रखने के संबंध में हाल ही में जारी अधिसूचना को संविधान से परे घोषित करने की मांग की गयी है। मुख्य न्यायाधीश एम.वाई. इकबाल और न्यायमूर्ति टी.एस. शिवज्ञानम की पीठ ने केंद्र सरकार की ओर से संज्ञान लेने वाले अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एम. रवींद्रन को निर्देश दिया कि तीन सप्ताह केऔरऔर भी

बिहार पूरे देश का इकलौता राज्य है जहां सूचना अधिकार (आरटीआई) के तहत ऑनलाइन आवेदन किया जा सकता है। वहां कोई भी कोई भी व्यक्ति किसी भी स्थान से 155311 पर फोन करके आवेदन लिखवा सकता है जिसे संबंधित कार्यालय के पीआईओ को डाक/ई-मेल द्वारा भेज दिया जाता है। इस व्यवस्था को आगे बढ़ाते हुए अब आम आदमी को ऑनलाइन आरटीआई आवेदन दर्ज कराने की सुविधा दे दी गई है। इस तरह की सुविधा न तो महाराष्ट्रऔरऔर भी

जो बात आप में से बहुतों ने नोट करने के बावजूद अनदेखी कर दी होगी, वो अब केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) की भी नजर में आ गई है और वह इसके प्रति काफी गंभीर है। देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) की बहुतेरी शाखाओं में तय सीमा वाले प्रीमियम की रसीदों पर रेवेन्यू स्टैम्प या रसीदी टिकट नहीं लगाया जाता जिससे सरकारी खजाने को हर साल भारी नुकसान हो रहा है। बताऔरऔर भी

सरकारी बैंकों में कर्मचारियों द्वारा की गई धोखाधड़ी के मामले में सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत मांगी गई सूचना का विभिन्न बैंकों ने अलग अलग नजरिया अपनाते हुए जबाव दिया। कुछ बैंकों ने तो यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि मांगी गई सूचना बैंकों में तैयार नहीं की जाती है। समाचार एजेंसी प्रेस ट्रस्ट की एक खबर के अनुसार, कुछ बैंकों ने कहा है कि धोखाधडी से जुड़े आईपीसी की धारा 420 के तहत आनेवालेऔरऔर भी

केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) राजधानी दिल्ली में होनेवाले संपत्ति के लेन-देन संबंधी सभी मामलों को सार्वजनिक करने पर विचार कर रहा है। इस बारे में उसने दिल्ली सरकार से उसकी राय पूछी है। मामला आरटीआई एक्ट (सूचना अधिकार कानून) के तहत दाखिल एस पी मनचंदा के आवेदन से जुड़ा है। उन्होंने दिल्ली सरकार के राजस्व विभाग से 2000 में उसकी संपत्ति के व्यापार से जुड़ी पंजीकरण जानकारी मांगी थी। लेकिन उन्हें बताया गया कि विभाग संपत्ति केऔरऔर भी