शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग अंततः विशुद्ध रूप से शत-प्रतिशत सट्टेबाज़ी है, भले ही हम उसे वित्तीय आज़ादी पाने, अपना बॉस खुद बनने या मुद्रास्फीति से लड़ने के माध्यम जैसा कितना भी सम्मानजनक नाम क्यों न दे दें। इसे हर किसी को स्वीकार करना ही पड़ेगा। इसके बाद असली मसला यह बचता है कि इस सट्टेबाज़ी के तत्व को कम से कम करने के लिए हम बाज़ार में सक्रिय शक्तियों के संतुलन की संभाव्य समझ किस हद तकऔरऔर भी

हर कोई शेयर बाज़ार में निवेश या ट्रेडिंग इसीलिए करता है कि जब शेयरों के भाव बढ़ेंगे तो बेचकर मुनाफा कमा लेंगे। यह अलग बात है कि इसी बाज़ार में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो शेयरों के भाव गिरने पर कमाते हैं। लेकिन उनका पूरा तंत्र और तरीका अलग है। फिलहाल तो अहम सवाल यह है कि शेयरों के भाव क्यों बढ़ते हैं? जवाब है कि इसके पीछे धन की महिमा है। धन जिन शेयरोंऔरऔर भी

शेयर बाज़ार से बिना धांधली या घोटाले के कितना कमाया जा सकता है इसकी मिसाल हैं राकेश झुनझुनवाला। अब वे इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन उनकी सीख भारत के सभी निवेशकों व ट्रेडरों के लिए प्रतिमान है। बाप मुंबई में इनकम टैक्स कमिश्नर थे तो धन-दौलत और शान-ओ-शौकत की कोई कमी नहीं थी। लेकिन बेटे को शेयर बाज़ार में लगाने के लिए पैसे देने से मना कर दिया और हिदायत दी कि वो दोस्तों से भीऔरऔर भी

मुद्रास्फीति रोकने का ज़िम्मा रिजर्व बैंक का है। उसके पास इसे निभाने के लिए एकमात्र साधन मौद्रिक नीति है। ब्याज दर बढ़ाकर वह धन महंगा करता है, सीआरआर बढ़ाकर मुद्रा का प्रवाह कम करता है। लेकिन अपने यहां खाद्य वस्तुओं की महंगाई सरकारी नीतियों से बढ़ती है। कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय भाव घटे। लेकिन केंद्र ने उसका लाभ उपभोक्ता तक पहुंचने नहीं दिया। एक्साइज़ बढ़ाकर उसने आठ साल में करीब 25 लाख करोड़ रुपए का टैक्स बजटऔरऔर भी

हमारे यहां दस साल पहले तक थोक मूल्य सूचकांक (WPI) पर आधारित मुद्रास्फीति प्रमुख थी। यह मुद्रास्फीति जून में 15.18% ऱही है। इसकी तुलना अमेरिका में प्रचलित प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स (PPI) आधारित मुद्रास्फीति से की जा सकती है जो जून में 9.1% और जुलाई में 8.5% है। साल 2012 से हम उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) पर आधारित मुद्रास्फीति पर आ गए। यह जून में 7.01% थी। लेकिन इसमें 45.86% योगदान खाने-पीने की चीजों का है। अकेले खानेऔरऔर भी

सिर पर चोट लगी हो तो आप घुटनों पर पट्टी नहीं बांधते। लेकिन अपने यहां भारतीय रिजर्व बैंक ऐसा ही कर रहा है। मुद्रास्फीति रोकने के लिए ब्याज दर बढ़ा देना अमेरिका जैसे विकसित देशों का सर्वमान्य तरीका है क्योंकि वहां धन सस्ता होने से लोग उधार पर लेकर जमकर खर्च करते हैं जिससे माल व सेवाओं की मांग बढ़ जाती है और सप्लाई सीमित होने के कारण मुद्रास्फीति या महंगाई बढ़ जाती है। इसलिए धन कोऔरऔर भी

शेयर बाज़ार वित्तीय जगत का हिस्सा है। दुनिया भर में वित्तीय जगत का केंद्र अब भी अमेरिका और उसका केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व है। अपने यहां इस वित्तीय जगत का सर्वेसर्वा है भारतीय रिजर्व बैंक। हमें शेयर बाज़ार की चाल को समझना है तो वित्तीय जगत की हर हलचल को हमेशा समझकर चलना होगा। तीन दिन पहले ही शुक्रवार को रिजर्व बैंक ने रेपो या बैंकों को एकाध दिन उधार पर धन देने की ब्याज दर 0.50%औरऔर भी

शक्तिकांत दास ने अगर सामान्य नहीं, आर्थिक इतिहास पढ़ा होता या वित्त मंत्रालय में रहते हुए सत्ता तंत्र के बजाय वित्तीय तंत्र की समझ बना ली होती तो उन्हें भलीभांति पता होता कि भारत जैसे निर्यात से ज्यादा आयात करने देश में विदेशी मुद्रा भंडार का मुख्य काम होता है चालू खाते (माल व सेवा) और पूंजी खाते (ऋण अदायगी से लेकर विदेशी निवेश), दोनों से संबंधित अंतरराष्ट्रीय सौदों को फाइनेंस करना। विदेशी मुद्रा भंडार जितना ज्यादा,औरऔर भी

भारतीय रिजर्व बैंक ने डॉलर के मुकाबले रुपए को बचाने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार का 11% हिस्सा बाजार में झोंक दिया। फिर भी गवर्नर दास कहते हैं कि अर्थव्यवस्था के मूलभूत पहलुओं के मजबूत होने के कारण रुपया कम गिरा है और उभरते देशों ही नहीं, यूरो, जापानी येन व ब्रिटिश पाउंड जैसे विकसित देशों की मुद्राएं डॉलर के मुकाबले ज्यादा गिरी हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण भी अर्थव्यवस्था के मजबूत होने का शोर मचा रहीऔरऔर भी

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने निकाली 2.74 लाख करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा। लेकिन हमारा विदेशी मुद्रा भंडार इसके ऊपर 53.34 लाख करोड़ रुपए और घट गया। खुद रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास की बात मानें कि इतनी बड़ी रकम डॉलर के सापेक्ष गिरते रुपए को बचाने में लगा दी गई। उनका कहना है, “आयात, ऋणों के मूलधन व ब्याज की अदायगी और पोर्टफोलियो निवेश के निकलने से बाज़ार में विदेशी मुद्रा की सप्लाई मांग के मुकाबलेऔरऔर भी