शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में स्टॉप-लॉस लगता ही लगता है। इससे कोई नहीं बच सकता। अनुभवी ट्रेडर इसकी पूरी तस्दीक करेंगे। किसी दिन व हफ्ते में ज्यादा नुकसान होता है तो किसी दिन व हफ्ते में कम। अनुभवी व कुशल ट्रेडर की हरचंद कोशिश होती है इस घाटे को कम से कम करना। इसके लिए वह ऐसा सिस्टम बनाता है जो उसके टेम्परामेंट से मेल खाता है। ध्यान रखें कि आप जितना सहज होकर ट्रेड करेंगे, कामयाबीऔरऔर भी

शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में सफलता के लिए दो चीजें बहुत ज़रूरी हैं। एक, घाटा कम से कम हो और दो, हम घाटे के सदमे से जल्दी से जल्दी बाहर निकल आएं। घाटा कम से कम रखने का एक तरीका यह है कि नए ट्रेडरों को स्टॉप-लॉस 2% से ज्यादा नहीं रखना चाहिए। मान लें कि कोई ट्रेडर महीने में दस में से चार सौदों में जीते और छह में हारे। चार में कम से कम 4-4%औरऔर भी

शेयर बाजार के ट्रेडरों की कामयाबी दर क्या है, यह उन्हें तो गिनना ही चाहिए, हमारी पूंजी बाजार नियामक सेबी को भी इसका हिसाब-किताब रखना चाहिए। तभी हम पतंगों की तरह इंट्रा-डे की तरफ उमड़े लाखों व्यक्तिगत ट्रेडरों को सही व व्यावहारिक वित्तीय शिक्षा दे सकते हैं। यूरोप में तो बाकायदा नियम है। इसके तहत सभी ऑनलाइन ब्रोकरों को घोषित करना पड़ता है कि उनके क्लाएंट या ग्राहकों की कामयाबी दर कितनी रही है? आप जानकर चौंकऔरऔर भी

शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में स्टॉप-लॉस का सामना उस्ताद से उस्ताद ट्रेडर तक को करना पड़ता है। बता दें कि विश्वस्तर पर एक रॉबिन कप ट्रेडिंग चैम्पियनशिप होती है। इसके डेटाबेस में ट्रेडिंग और ट्रेडरों के बिजनेस का भरपूर डेटा मिल जाता है। इसके मुताबिक विश्व चैम्पियन स्तर के ट्रेडर बड़ी मुश्किल से 60% से ज्यादा की कामयाबी दर हासिल कर पाते हैं। मतलब, दस में से चार सौदों में उन्हें आम तौर पर घाटा या स्टॉप-लॉसऔरऔर भी

शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग हर नज़रिए से एक तरह का बिजनेस है और हर बिजनेस की तरह इसकी भी खास लागत होती है। दिक्कत यह है कि इंट्रा-डे ट्रेडर इस सच्चाई को सोख नहीं पाते। वे हमेशा जीतना चाहते हैं और हारने पर उनका दिल-दिमाग सब बैठ जाता है। यह नौसिखिया ट्रेडर की मानसिकता है, किसी अनुभवी या कामयाब ट्रेडर की नहीं। असल में जीतने का हुनर तो बहुतेरे लोग सिखाते हैं। इंटरनेट पर ऐसी सामग्री कीऔरऔर भी

सालों-साल से शेयर बाज़ार में घुसनेवाले ज्यादातर ट्रेडर इंट्रा-डे ट्रेडिंग से शुरुआत करते हैं। उनमें न तो लम्बे निवेश का धैर्य होता है और न ही दो-चार दस दिन से लेकर एकाध महीने तक इंताज़ार कर पाने का माद्दा। दिन का दिन में सौदा काटा और निकल गए। आखिर आज का रिस्क कुछ दिन तक क्यों खींचा जाए! इस सोच में कोई समस्या नहीं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि अधिकांश इंट्रा-डे ट्रेडर अपना कोई सिस्टम बनाएऔरऔर भी

नियमतः शत-प्रतिशत और व्यवहार में अधिकांश इंट्रा-डे ट्रेडर व्यक्तिगत स्तर पर ट्रेड करते हैं। भोर में घर से निकल जाते हैं। किसी ब्रोकर या सब-ब्रोकर के यहां दिन के दिन में सौदे निपटाकर देश शाम घर लौट जाते हैं। उनकी यह भी खासियत है कि वे कहीं से भी मिल गई टिप्स क पीछे भाग पड़ते हैं। इस चक्कर में ऐसे आलतू-फालतू स्टॉक्स पर दांव लगा बैठते हैं जिनके बारे में किसी से खास कुछ सुना नहींऔरऔर भी

इंट्रा-डे ट्रेडिंग के कुछ नियम-धर्म हैं जिनका पालन ज़रूरी है। पहला, उन्हीं स्टॉक्स में ट्रेड करें जिनमें अच्छा-खासा कारोबार होता है। व्यावहारिक मतलब यह कि निफ्टी-50, निफ्टी नेक्स्ट-50 या निफ्टी-100 जैसे सूचकांकों में शामिल स्टॉक्स में ही ट्रेड करें। दूसरा, कभी भी बाज़ार से पंगा न लें। उसके रुख से उल्टा चलने का दुस्साहस न करें। बाज़ार कमज़ोरी के संकेत दे रहा है तो कभी भी खरीद के सौदे न करें और सामर्थ्य हो तो शॉर्ट करें।औरऔर भी

इंट्रा-डे ट्रेडिंग शेयर बाज़ार में सबसे ज्यादा रिस्की व तनाव भरा उद्यम है, शायद फ्यूचर्स व ऑप्शंस से भी ज्यादा। मगर न जानें क्यों हमारी पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी ने इसे व्यक्तिगत निवेशकों या कहें तो रिटेल ट्रेडरों के लिए ही खोल रखा है। संस्थाओं का प्रवेश इसमें वर्जित है। संभव है कि बैंक, म्यूचुअल फंड, बीमा कंपनियां या विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) इसे मानते हों। लेकिन जितने भी ब्रोकरेज हाउसेज़ हैं, वे तो जमकर डे-ट्रेडिंगऔरऔर भी

वित्तीय जगह में नीतियों से लेकर बाज़ार तक भारी उथल-पुथल का दौर चल रहा है। अपने यहां रिजर्व बैंक ने ब्याज दर एक बार फिर 0.50% उठाकर 5.90% पर पहुंचा दी। अमेरिका का फेडरल रिजर्व कई बार ब्याज बढ़ाने के बाद आगे भी बढ़ाते रहने पर आमादा है। शेयर बाजार ऐसी भारी उहापोह में जमकर ऊपर-नीचे होता रहता है। हालत यह है कि दिन में निफ्टी का 200-250 अंक उठना-गिरना आज सामान्य बात बन गई है। ऐसेऔरऔर भी