अच्छी बातें किसी गाड़ी के विज्ञापित माइलेज की तरह होती हैं जो आदर्श स्थितियों में ही लागू होती हैं। उन्हें अपनी हकीकत से न मिलाया जाए तो वे महज बातें ही रह जाती हैं। इसलिए ज़िंदगी में पढ़ने व सुनने से ज्यादा गुनना जरूरी है।और भीऔर भी

अपने तक सीमित। खूंटे से बंधी ज़िंदगी। परोक्ष रूप से तंतुओं के तंतु भले ही ग्लोबल हो गए हों, लेकिन प्रत्यक्ष रूप से रिश्ते बहुत सिकुड़ गए हैं। ऐसे में हांकनेवालों की मौज है क्योंकि किसी को सिर उठाकर उनकी तरफ झांकने की फुरसत ही नहीं है।और भीऔर भी

जिंदगी में हमेशा बच्चे रहे। जुबान के हमेशा कच्चे रहे। सोच में हमेशा लुच्चे रहे। हर किसी को अपने आगे टुच्चा समझते रहे। ऐसे में दुनिया क्या खाक सधेगी? अपने में ही डूबे रहे और जमाने को देखा-भाला नहीं तो वह भाव दे भी तो भला कैसे!और भीऔर भी

शरीर है। क्रिया-प्रतिक्रिया की लीला ही जीवन है, उसकी चमक है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि अंदर चमक देनेवाली कोई वस्तु अलग से बैठी है। सूरज जो इस सृष्टि के जीवन का आधार है, उसमें रौशनी फेंकने वाली कोई आत्मा नहीं विराजती।और भीऔर भी

ज़िंदगी में सुरक्षा की ही नहीं, असुरक्षा की भी ज़रूरत होती है। बूढ़े या असहाय लोग सुरक्षा की चाह रखें तो समझ में आता है। लेकिन नौजवानों के लिए यह चाह अच्छी नहीं क्योंकि असुरक्षा के बिना वे जीवन के तमाम जरूरी सबक नहीं सीख पाते।और भीऔर भी

जिंदगी के हाईवे पर मुसीबतें इसलिए नहीं आतीं कि आप लस्त होकर चलना ही बंद कर लें, बल्कि मुसीबतों का हर दौर आपको वह मौका उपलब्ध कराता है जब आप ठहरकर अब तक के सफर की समीक्षा और आगे की यात्रा की तैयारी कर सकते हैं।और भीऔर भी

आप कितने धन से शुरू कर रहे हैं, सफलता इससे नहीं, बल्कि इससे तय होती है कि आपके पास जो कुछ भी है, उसे आप कैसे संभालते और लगाते हैं। जो भी बौद्धिक-भौतिक संपदा आपकी है, उसके सही नियोजन व धैर्य से धनवान बना सकता है।और भीऔर भी

हमें हर वक्त अपना काम इतना टंच रखना चाहिए और जीवन को इतने मुक्त भाव से जीना चाहिए कि अगले ही पल अगर मौत हो जाए तो कतई मलाल न रहे कि हमने ये नहीं किया या वो नहीं किया। जिम्मेदारी से जीना। मुक्त मन से जाना।और भीऔर भी

चीजें जो कल थीं, आज नहीं हैं। आज जैसी हैं, वैसी कल नहीं रहेंगी। परिवर्तन का यही नियम है। यही जीवन है। इसलिए कल से चिपके रहने या आज को लेकर रोते रहने का कोई मतलब नहीं। सबक लो, बढ़ते चलो। यही सही है और उचित भी।और भीऔर भी

प्रकृति खुद को नई करती रहती है तो हर तरफ जीवन है। समाज को हमने, इंसानों ने बनाया है जिसकी संरचना चरण-दर-चरण जटिल होती जा रही है। इसे हम बराबर नया नहीं करते रहे तो इसमें जान नहीं बचेगी, वो मृत हो जाएगा।और भीऔर भी