शेयर बाज़ार में इधर एक खास पैटर्न दिख रहा है। कुछ दिन गिरने के बाद अचानक एकाध दिन वो बढ़ जाता है। लेकिन उसके बाद फिर कई दिनों तक गिरता जाता है। एडवांस-डिक्लाइन अनुपात किसी दिन चढ़ जाता है। फिर कई दिन तक नीचे डूबता जाता है। इसकी खास वजह है कि शेयरों को चढ़ाने के लिए धन का जो सतत प्रवाह चाहिए, वह अभी तक सूखता गया और आगे भी सटोरिया खरीद के लिए ज़रूरी धनऔरऔर भी

डेरिवेटिव सौदों का सच यह है कि हमारा शेयर बाज़ार अक्टूबर 2021 में जब शिखर पर था, तब निफ्टी फ्यूचर्स की लॉन्ग पोजिशन को कोई जून माह तक रोलओवर करे तो बाज़ार 20% से भी ज्यादा गिर चुका है। हालत यह है कि निफ्टी के स्पॉट या कैश सेगमेंट के भाव से जुलाई का निफ्टी फ्यूचर्स मात्र 0.14%, अगस्त का निफ्टी फ्यूचर्स मात्र 0.34% और सितंबर का निफ्टी फ्यूचर्स मात्र 0.62% ऊपर या प्रीमियम पर है। यहऔरऔर भी

क्या सौ साल से ज्यादा पुराने शेयर बाज़ार के डाउ सिद्धांत को अब भी सही माना जा सकता है? यकीनन माना जा सकता है, लेकिन हू-ब-हू नहीं। 1704 में लाया गया न्यूटन का सिद्धांत इसलिए नहीं गलत हो जाता कि वह पांच सौ साल से ज्यादा पुराना है। लेकिन उसे आइंसटाइन से लेकर मैक्स प्लांक तक के सिद्धांत से मिलाकर लागू किया जाता है। डाउ सिद्धांत जब आया था, तब शेयर बाज़ार में सारे सौदे स्पॉट याऔरऔर भी

क्या हमारा शेयर बाज़ार सालों की तेज़ी के बाद अब मंदी की गिरफ्त में आ चुका है? डाउ सिद्धांत कहता है कि बाज़ार अपने शिखर से 20% गिर जाए तो मंदी का दौर आज जाता है। निफ्टी-50 सूचकांक का ऐतिहासिक शिखर 19 अक्टूबर 2021 को 18,604.45 का है, जबकि 52 हफ्तों का न्यूनतम स्तर 17 जून 2022 को दर्ज 15,183.40 का है। अभी यह सूचकांक 15,752.05 पर है, ऐतिहासिक शिखर से 15.33% नीचे। यह शिखर से 20%औरऔर भी

कमज़ोर होते रुपए से ऐसी तमाम कंपनियों पर नकारात्मक असर पड़ रहा जो कच्चा माल विदेश से आयात करती हैं या बाहर से अंतिम उत्पाद मंगाकर घरेलू बाज़ार में बेचती हैं। बाहर से कच्चा हीरा मंगाकर उसे तराशने व चमकाने के बाद निर्यात कर देनेवाली कंपनियों पर खास असर नहीं पड़ हा। लेकिन रसायन या दवाओं के अवयव आयात करनेवाली कंपनियों का धंधा मंदा पड़ता जा रहा है। यूपीएल जैसी मजबूत कंपनी का शेयर यूं ही नहींऔरऔर भी

बढ़ता ब्याज और डॉलर के मुकाबले फिसलता रुपया हमारी बहुतेरी कंपनियों के लिए बड़ी मुसीबत बन गया है। ब्याज बढ़ने से सबसे पहले प्रभावित हो रहे हैं बैंक और गैर-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियां या एनबीएफसी। बैंक पब्लिक से बचत खातों या एफडी वगैरह से ही धन जुटाकर धंधा करते हैं। यह धन उनका कच्चा माल है जो  अब महंगा हो गया है क्योंकि पब्लिक को उन्हें अधिक ब्याज देना पड़ रहा है। एनबीएफसी बैंकों से ही उधार लेकरऔरऔर भी

वित्तीय जगत आज ग्लोबल हो गया है। इस जगत का केंद्र है अमेरिका। अमेरिका की हलचल यूरोप से लेकर एशिया तक को लपेट लेती है। उसने ब्याज बढ़ाई तो दूसरे देशों को ब्याज दर बढ़ाना ही पड़ता है। वे अगर ब्याज न बढ़ाएं और अमेरिका में ब्याज दर उनसे ज्यादा हो तो उनका धन निकलकर अमेरिका भागने लगेगा। इस तरह डॉलर निकलते रहे तो उसके मुकाबले उनकी अपनी मुद्रा कमज़ोर पड़ती जाएगी। उनके निर्यात डॉलर में सस्तेऔरऔर भी

ब्याज बढ़ने से धन की लागत बढ़ जाती है। शेयर बाज़ार पर इसका सीधा असर यह पड़ता है कि जो विदेशी निवेशक अपने देशों से सस्ता धन लेकर भारत जैसे बाज़ार में लगाते थे, उनके लिए यह महंगा सौदा बन गया है। ऊपर से डॉलर के मुकाबले छीझता जा रहा रुपया कोढ़ में खाज बन गया है। वे भारतीय बाज़ार से रुपए में ज्यादा भी कमा लें तो उनकी कमाई डॉलर में कम हो जाती है। नतीजतन,औरऔर भी

अमेरिका से लेकर यूरोप और भारत तक में ब्याज दरें बढ़ाने का सिलसिला चला हुआ है। तात्कालिक मकसद है चढ़ती मुद्रास्फीति पर काबू पाना, जबकि अंतिम मसकद है अर्थव्यवस्था को नई गति देना। भारत में आर्थिक सुस्ती या ठहराव आ सकता है। लेकिन अमेरिका और यूरोप में तो मंदी की आशंका गहराती जा रही है। इससे डरकर सारी दुनिया के शेयर बाज़ार डूबने लगे हैं। बड़ी सीधी-सरल बात है कि ब्याज दर बढ़ने से बॉन्डों के दामऔरऔर भी

अपने यहां मांग ज्यादा होने से कारण महंगाई नहीं आई है। दगरअसल, नवंबर 2016 में नोटबंदी के बाद पांच सालों से लोगों की आमदनी घट रही है। कामधंधा मंदा चल रहा है। नतीज़तन मांग घट गई है। वाहनों से लेकर उपभोक्ता वस्तुओं के उद्योग तक मजबूरन क्षमता से कम उत्पादन कर रहे हैं। फिर भी इस दौरान अगर रिटेल निवेशकों ने शेयर बाज़ार में जमकर धन लगाया है तो ऐसा करनेवाले आम नहीं, बेहद खास लोग हैं।औरऔर भी