इंट्रा-डे ट्रेडिंग शेयर बाज़ार में सबसे ज्यादा रिस्की व तनाव भरा उद्यम है, शायद फ्यूचर्स व ऑप्शंस से भी ज्यादा। मगर न जानें क्यों हमारी पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी ने इसे व्यक्तिगत निवेशकों या कहें तो रिटेल ट्रेडरों के लिए ही खोल रखा है। संस्थाओं का प्रवेश इसमें वर्जित है। संभव है कि बैंक, म्यूचुअल फंड, बीमा कंपनियां या विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) इसे मानते हों। लेकिन जितने भी ब्रोकरेज हाउसेज़ हैं, वे तो जमकर डे-ट्रेडिंगऔरऔर भी

वित्तीय जगह में नीतियों से लेकर बाज़ार तक भारी उथल-पुथल का दौर चल रहा है। अपने यहां रिजर्व बैंक ने ब्याज दर एक बार फिर 0.50% उठाकर 5.90% पर पहुंचा दी। अमेरिका का फेडरल रिजर्व कई बार ब्याज बढ़ाने के बाद आगे भी बढ़ाते रहने पर आमादा है। शेयर बाजार ऐसी भारी उहापोह में जमकर ऊपर-नीचे होता रहता है। हालत यह है कि दिन में निफ्टी का 200-250 अंक उठना-गिरना आज सामान्य बात बन गई है। ऐसेऔरऔर भी

विदेशी पोर्टफोलियो या संस्थागत निवेशक आज भारतीय शेयर बाज़ार में हर्षद मेहता जैसे बड़े ऑपरेटर की हैसियत हासिल कर चुके हैं। जब चाहते हैं किसी कंपनी या क्षेत्र के शेयरों को उठा या पीट देते हैं। उन्हें धीरे-धीरे बटोरने के बाद चढ़ाने लगते हैं और जमकर मुनाफा कमाते हैं। उन्होंने हाल में आईटी क्षेत्र के साथ यही किया। ऐसा बेचा कि इन्फोसिस, विप्रो, टीसीएस, एचसीएल टेक्नोलॉजीज, टेक महिंद्रा व ओरैकल फाइनेंशियल सर्विसेज़ जैसी कंपनियों के शेयर 52औरऔर भी

क्या एफआईआई फिर लौटकर पहले जैसे जोशोखरोश के साथ भारत आएंगे? यकीनन, उनको आना ही है, बशर्ते भारतीय बाज़ार में उन्हें अमेरिका या अन्य विकसित देशों से ज्यादा रिटर्न मिलता है। अर्थशास्त्रियों से लेकर तमाम बाज़ार विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था का कितना भी कुप्रबंधन कर लिया जाए, लेकिन उसकी आंतरिक सामर्थ्य इतनी ज्यादा है कि उसे निखरने से कोई रोक नहीं सकता। वैसे, अब भी हम गौर करें तो सेंसेक्स का प्रदर्शन डाउ जोन्सऔरऔर भी

आज विदेशी संस्थागत या पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) हमारे शेयर बाज़ार के दिशा-निर्धारक बन गए है। पूरे बाजार ही नहीं, तमाम अच्छे-खासे मजबूत स्टॉक्स की नियति उनकी मुठ्ठी में है। वे ही इनका रुख तय करते हैं। कोई फंडामेंटल नहीं, केवल विदेशी धन या निवेश का प्रवाह भावों को तय करने लगा है। मौजूदा साल 2022 में जुलाई से अब तक भारतीय शेयर बाज़ार में 57,579 करोड़ रुपए की शुद्ध खरीद के बावजूद उन्होंने कुल मिलाकर 1,59,779 करोड़औरऔर भी

अमेरिका का शेयर बाज़ार घटे-बढ़े तो टोक्यो का शेयर बाज़ार घट-बढ़ जाता है। इनके असर से भारत से लेकर कोरिया तक के स्टॉक एक्सचेंज बच नहीं पाते। कभी-कभी लंदन और ऑस्ट्रेलिया की दिशा अलग होती है। लेकिन यूरोप के शेयर बाज़ार तो कुल मिलाकर अमेरिका को ही फॉलो करते हैं। ऐसे में तमाम देशों की अपनी अर्थव्यवस्थाओं की स्थिति शेयर बाज़ार के संदर्भ में अक्सर बेमानी हो जाती है और अमेरिकी अर्थव्यवस्था की स्थिति निर्णायक। आखिर क्याऔरऔर भी

दुनिया भर के वित्तीय बाज़ारों का केंद्र अमेरिका है। दुनिया की हर बड़ी-छोटी मुद्रा की संदर्भ मुद्रा अमेरिकी डॉलर है, भले ही वह बिटिश पाउंड हो या यूरोप का यूरो हो, जापान का येन हो, इंडोनेशिया का रुपैया हो या भारत का रुपया। अपना रुपया तो डॉलर के मुकाबले कमज़ोर होता-होता 81 रुपए तक जा पहुंचा है। हालांकि यूरो के मुकाबले वो मजबूत होकर 82 से 79 रुपए हो गया है। लेकिन इस तरह मुद्रा के डावांडोलऔरऔर भी

वॉरेन बफेट किसी भी कंपनी में निवेश करने से पहले उसके मूलभूत पहलुओं का बेहद गहराई और बारीकी से अध्ययन करते रहे हैं। लेकिन गुण के साथ मात्रा का संतुलन ज़रूरी है। उनका कहना है, “सचमुच ज्यादा धन वही निवेशक बनाते हैं जो क्वालिटी के आधार पर सही फैसले करते हैं। लेकिन कम से कम मेरे विचार से पक्का धन मात्रा संबंधी फैसलों से बनता है।” इसी सोच पर चलते हुए बफेट संभावनाओं से भरी छोटी कंपनियोंऔरऔर भी

वैसे तो निवेश भी एक तरह की ट्रेडिंग है। वह लम्बे समय की ट्रेडिंग है, जबकि ट्रेडिंग छोटे समय का निवेश। राकेश झुनझुनवाला ने दोनों को मिलाकर शेयर बाज़ार में कामयाबी हासिल की। लेकिन वॉरेन बफेट ने खुद को हमेशा निवेश तक सीमित रखा। वे अपने गुरु बेन ग्राहम से सीखे सिद्धांतों पर डटे रहे। उनमें काफी कुछ नया भी जोड़ा। उनकी सफलता के पीछे निवेश की प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि स्टॉक्स का चयन भी था। ऐसाऔरऔर भी

वॉरेन बफेट ने निवेश के शुरुआती दस सालों में बराबबर 30% से ज्यादा सालाना चक्रवृद्धि दर (सीएजीआर) से रिटर्न कमाया। 31.6% का यह रिटर्न उन्होंने अपने शुरुआती निवेश उद्यम, बफेट पार्टनरशिप के ज़रिए साल 1957 से 1968 तक की अवधि में हासिल किया। उस दौरान अमेरिका के बेंचमार्क शेयर सूचकांक डाउ जोन्स का रिटर्न 9.1% था। उन दिनों बफेट का लक्ष्य था निवेश से कम से कम 10% सीएजीआर से कमाकर बेंचमार्क सूचकांक को मात देना। बादऔरऔर भी