वो 6 नवंबर 2106 की तारीख थी, जब भारतीय रिजर्व बैंक की स्वायत्तता पर पहला हमला हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अचानक रात 8 बजे राष्ट्र के नाम संदेश में ऐलान कर दिया कि रात 12 बजे से 500 और 1000 रुपए के नोटों की वैधता खत्म की जा रही है। कहा गया कि इससे देश में कालाधन, आतंकवाद व नकली नोटों जैसी तमाम समस्याएं खत्म हो जाएगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। मगर, बड़ा अपराध यहऔरऔर भी

शेयर बाज़ार वित्तीय जगत का एक छोटा-सा हिस्सा है। किसी देश के वित्तीय जगत के केंद्र में होता है उसका केंद्रीय बैंक। नोटों के प्रबंधन से लेकर मौद्रिक नीति तक का निर्धारण वही करता है। केंद्रीय बैंक देश के वित्तीय बाज़ार के लिए हृदय का काम करता है। बैंक उसके लिए धमनी तंत्र जैसे हैं। देश की मुद्रा अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगी होगी या सस्ती, बाज़ार की इस क्रिया पर भी अंकुश लगाने का अहम काम केंद्रीयऔरऔर भी

शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग इस मायने में बेहद खतरनाक खेल है क्योंकि यहां नोट से नोट बनाए जाते हैं। हर्र लगे न फिटकरी, रंग भी चोखा आए। शेयरों में निवेश से धन-दौलत तभी बनती है, जब कंपनी अच्छा धंधा करती है। वहां कंपनी प्रबंधन के कौशल व मेहनत से मूल्य का सृजन होता है और उसका एक अंश शेयरधारक होने के नाते हमें मिलता है। लेकिन ट्रेडिंग तो ज़ीरोसम गेम है। एक का नुकसान, दूसरे का फायदा।औरऔर भी

शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग लालच व भय की आदिम भावनाओं का खेल है। इसका नियंत्रण हमारे शरीर मे भीतर ही भीतर रिसने वाला एक हॉर्मोन एड्रेनालाइन करता है। इसे ‘फाइट-ऑर-फ्लाइट हॉर्मोन’ के रूप में भी जाना जाता है। इसका स्राव शरीर में तनावपूर्ण, रोमांचक, खतरनाक या खतरे की स्थिति के जवाब में खुद-ब-खुद होने लगता है। यह प्रकृति की बनाई व्यवस्था है। एड्रेनालाइन हमारे शरीर को अधिक तेज़ी से प्रतिक्रिया करने में मदद करता है। असल मेंऔरऔर भी

देशी-विदेशी संस्थाएं औरों का धन ही शेयर बाज़ार में लगाकर मैनेज करती है। लेकिन लाख टके का सवाल है कि दूसरे के धन को मैनेज करने का यह काम दरअसल होता क्या है? इसमें काम यह नहीं होता कि दुनिया कैसे काम करती है, युद्ध छिड़ा है या शांति है, यहां तक कि अर्थव्यवस्था कैसे काम कर रही है, इससे भी इसका कोई मतलब नहीं होता। यहां तो बस उन स्टॉक्स को पकड़ना होता है जो दूसरेऔरऔर भी

म्यूचुअल फंड से लेकर बैंक, बीमा कंपनियां और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) तक अपने धन पर नहीं, दूसरों के धन पर धंधा करते हैं। दूसरों को जब तक ज्यादा कमाकर देते हैं, तब तक वे उनके साथ बने रहते हैं। नहीं तो छोड़कर कहीं और चले जाते हैं। सभी देशी-विदेशी निवेशक संस्थाएं सिस्टम बनाकर चलती हैं और अमूमन उनका धंधा बराबर बढ़ता ही रहता है। कमाल की बात यह है कि बाज़ार गिरता है, तब भी उनकेऔरऔर भी

अपने यहां महिलाओं का बहुत बड़ा हिस्सा घर-परिवार चलाने के बेहद ज़रूरी काम में रात-दिन लगा रहता है। लेकिन उन्हें इसका कहीं से कोई भुगतान नहीं मिलता तो इन महिलाओं की गिनती देश की श्रम शक्ति में नहीं होती। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के एक नए अध्ययन में हिसाब लगाया गया है कि अगर महिलाओं को इस अनपेड काम का भुगतान मिलने लग जाए तो इससे हमारे जीडीपी या अर्थव्यवस्था में लगभग 7.5% का इज़ाफा हो जाएगा।औरऔर भी

सरकार का सर्वेक्षण कहता है कि बीते वित्त वर्ष 2022-23 में देश में 15 साल के ऊपर के सभी भारतीयों की श्रम बल या बाज़ार में भागादारी 54.6% है जिसमें से महिलाएं 31.6% हैं। वहीं, प्रोफेशनल संस्था सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) का कहना है कि श्रम बाजार में यह भागीदारी 2022-23 में मात्र 39.5% रही है जो 2016-17 के बाद का न्यूनतम स्तर है। इसमें भी केवल पुरुषों का हिस्सा 66% है, जबकि महिलाओं काऔरऔर भी

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः से लेकर नारी शक्ति वंदन अधिनियम तक भारत में महिला शक्ति का बड़ा हल्ला है। लेकिन जिस देश में प्रधानमंत्री तक महिला हुई है, अभी वित्त मंत्री और राष्ट्रपति तक महिला हैं, क्या वहां महिलाएं सशक्त हुई हैं और श्रम बाज़ार में उनकी मजबूत भागीदारी है? भारत दुनिया के उन मुठ्ठी भर देशों में शुमार हैं जहां श्रम बाज़ार में महिलाओं की भागीदारी भयंकर गति से घटी है। इस पतन मेंऔरऔर भी

क्लाउडिया गोल्डिन ने अमेरिका ही नहीं, दुनिया के सौ से ज्यादा देशों के डेटा के गहन विश्लेषण से ऐसे तथ्य निकाले हैं जिन्होंने महिलाओं की श्रम भागीदारी के बारे में सदियों से चले आ रहे मिथकों को तोड़ दिया। माना जाता था कि आर्थिक विकास व औद्योगिकीकरण से श्रम बाज़ार में महिलाओं का आना बढ़ता जाएगा। गोल्डिन ने बताया कि हकीकत यह है कि 19वीं सदी में औद्योगिकीकरण से पहले महिलाएं बाहर ज्यादा काम करती थीं। लेकिनऔरऔर भी