कौन इंद्रजीत!
इंद्रियां हैं, हार्मोंस हैं, तभी जीवन है। नहीं तो मर गए समझो। मेलमिलाप, सुख-दुख इन्हीं से तो है। कोई इंद्रजीत नहीं। संत नहीं, ढोंगी हैं। हां, दुनिया-समाज को समझने के लिए अपने से बाहर निकलना पड़ता है जिसके लिए इंद्रियों का शमन करना पड़ता है।और भीऔर भी
बुद्ध क्यों नहीं!
बाहर से सब कुछ भरा-पूरा, अंदर से परेशान। सदियों पहले एक राजकुमार इसी उलझन को सुलझाने निकला तो बुद्ध बन गया। नया दर्शन चल पड़ा। सदियों बाद लाखों लोग सब कुछ होते हुए भी वैसे ही बेचैन हैं। लेकिन कोई बुद्ध नहीं बनता। आखिर क्यों?और भीऔर भी
कैसी भागमभाग!
सारी दुनिया दौलत के पीछे भाग रही है। काम, काम, काम। भागमभाग। लगे रहो ताकि धन बराबर आता रहे। लेकिन इससे कहीं ज्यादा अहम है इसकी चिंता करना कि हम अपने घर-परिवार के साथ ज्यादा भावपूर्ण रागात्मक ज़िंदगी कैसे जी सकते हैं।और भीऔर भी
खुश रहें, तभी सीखेंगे
हालात जितने मुश्किल हों, हमारी मुस्कान उतनी ही बढ़ जानी चाहिए। अन्यथा हम मुश्किलों से सीख नहीं पाएंगे। हम दुखी नहीं, खुश रहने पर ही सीख पाते हैं। और, खुश रहना एक मानसिक अवस्था है जिसकी कुंजी हमेशा हमारे हाथ में रहती है।और भीऔर भी
सफलता की सोच
दुनिया में कुछ भी स्थाई नहीं। न मौसम और न ही सरकार। ज़िंदगी में भी कुछ स्थाई नहीं। न सुख और न ही दुख। सब कुछ निरंतर बदलता रहता है। इसलिए जीवन में सफलता से आगे बढ़ने का एक ही तरीका है कि हम इस सच को स्वीकार कर लें।और भीऔर भी
नए की पीड़ा
सृजन व पीड़ा में अभिन्न रिश्ता है। प्रकृति ने तो सृजन की हर प्रक्रिया के साथ खुशी व उन्माद के ऐसे भाव जोड़ रखे हैं कि पीड़ा गौड़ हो जाती है। सामाजिक सृजन में इंसान को यह काम खुद करना पड़ता है।और भीऔर भी
शख्स एक, दांव 209 अरब डॉलर के!
आर्थिक रफ्तार के थमने ने कम से कम चीन को इतनी सद्बुद्धि तो दे दी कि उसने बैंकों के लिए निर्धारित कैश रिजर्व अनुपात में कमी कर दी है, जबकि इसकी अपेक्षा भारत में की जा रही थी। अपने यहां तो लगता है कि राजनीति देश और देशवासियों से ज्यादा बड़ी हो गई है। देश का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) महज 6.9 फीसदी बढ़ा, जो 2009 के न्यूनतम स्तर 5.5 फीसदी के काफी करीब है। ऐसे मेंऔरऔर भी
ये सट्टेबाजी नहीं, विशुद्ध जुएबाजी है
संसद में छाया राजनीतिक गतिरोध सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी को रिटेल में एफडीआई या सिविल एविएशन को विदेशी एयरलाइंस के लिए खोलने जैसे बड़े फैसले नहीं लेने देगा। अभी तक इस सेटलमेंट में इन दोनों ही सेक्टरों के स्टॉक्स काफी ज्यादा खरीदे जा चुके हैं। अब वे कैश सेटलमेंट के नए शिकार हैं। इसलिए इनमें खरीद करते वक्त काफी सावधान रहने की जरूरत है। पिछले सेटलमेंट में मैंने आपको डिश टीवी के बारे में जो बताया था, वोऔरऔर भी


