दुनिया में जॉर्ज सोरोस, स्टेनली ड्रकेनमिलर व वॉरेन बफेट जैसे दिग्गज निवेशकों का रिटर्न अमूमन 20% तक रहता आया है। कभी-कभार ही वह 30% से ऊपर पहुंचता है। निवेश से जमकर कमाना कोई बाएं हाथ का खेल नहीं है। लेकिन राकेश झुनझुनवाला ने अपनी बहुत छोटी-सी टीम के साथ अकेले दम पर शेयर बाज़ार से शानदार रिटर्न कमाया। उनके ज्यादा रिटर्न कमानेवाले जेम्स साइमंस एक तो खुद गणितज्ञ हैं, दूसरे उन्होंने बेहद मेधावी गणितज्ञों व भौतिकविदों कीऔरऔर भी

बताते हैं कि राकेश झुनझुनवाला में 1985 में ₹5000 से अपनी निवेश यात्रा शुरू की। 14 अगस्त 2022 को जब हार्ट-अटैक से उनका निधन हुआ, तब उनके निवेश का कुल बाज़ार मूल्य एक अनुमान के मुताबिक ₹50,000 करोड़ और दूसरे अनुमान के मुताबिक ₹30,000 करोड़ रुपए था। पहले अनुमान में उनके सालाना चक्रवृद्धि रिटर्न की दर (सीएजीआर) 64.52% निकलती है, जबकि दूसरे अनुमान में यह 62.26% निकलती है। इतना रिटर्न न वॉरेन बफेट कमा पाए हैं, नऔरऔर भी

राकेश झुनझुनवाला को भारत का वॉरेन बफेट कहा जाता था। बफेट दुनिया में महानतम निवेशकों में शुमार हैं। 1930 में जन्मे बफेट 92 साल की उम्र में अब भी सक्रिय हैं, जबकि 1960 में जन्मे झुनझुनवाला महीने भर पहले 62 साल की उम्र में दुनिया से विदा हो गए। लेकिन शायद ही कोई जानता है कि निवेश में झुनझुनवाला बफेट से कहीं ज्यादा कामयाब रहे। बफेट ने अपने पहले निवेश उद्यम में 1957 से 1968 तक 31.6%औरऔर भी

दुनिया की अर्थव्यवस्था में इस समय एकदम अलग तरह का बदलाव हो रहा है। वैश्विक कंपनियां अपने माल के लिए चीन से बाहर का कोई ठौर खोज रही हैं। इस मांग का छोटा-सा हिस्सा भी भारत को मिल गया तो हमारी बहुत सारी कंपनियों की चांदी हो सकती है। लेकिन इस अवसर का फायदा उठाने के लिए क्षमता बढ़ाने की ज़रूरत होगी और इसके लिए पूंजी निवेश चाहिए। पूंजी निवेश वही कंपनियां कर सकती हैं जिन परऔरऔर भी

कभी तेज़ी तो कभी मंदी के बीच हिचकोले खाता हमारा शेयर बाज़ार आखिर लम्बी तेज़ी का हाईवे कब पकड़ सकता है? इसका जवाब सीधे-सीधे अर्थव्यवस्था में पूंजी निवेश के चक्र से जुड़ा हुआ है। साल 2003 से 2007 के बीच देश में जमकर पूंजी निवेश का चक्र चला तो उस दौरान बीएसई सेंसेक्स सात गुना बढ़ गया, जबकि बीएसई स्मॉलकैप सूचकांक तो 16 गुना चढ़ गया। जानकार मानते हैं कि हम फिलहाल वैसे ही पूंजी निवेश केऔरऔर भी

वैसे तो शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग से लेकर निवेश तक में सफलता का सारा खेल प्रायिकता पर निर्भर है। लेकिन आज के दौर में जब पलड़ा न इधर भारी हो न उधर, तब प्रायिकता या प्रोबैबिलिटी पर आधारित रणनीति ही सबसे माकूल हो सकती है। प्रायिकता की गणना सांख्यिकी का विषय है। लेकिन आम बोलचाल में हम इसे किसी स्टॉक या सूचकांक के बढ़ने की संभावना और गिरने की आशंका से समझ सकते हैं। यह भी एकऔरऔर भी

ट्रेडर भागते हैं तो निवेशक संभाल लेते हैं और निवेशक भागते हैं तो ट्रेडर आगे आ जाते हैं। शायद यही वजह है कि अपने यहां अक्टूबर 2021 से विदेशी पोर्टपोलियो निवेशकों के बराबर निकलते रहने के बावजूद शेयर बाज़ार धराशाई नहीं हुआ। भारतीय निवेशकों व ट्रेडरों में अभी तक कहीं न कहीं आस बची हुई है। अमूमन, जब हर तरह के निवेशकों व ट्रेडरों पर तेज़ी का सुरूर सवार हो जाता है, तब तेजी का नया दौरऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में कभी-कभी छोटी अवधि के ट्रेडरों के साथ ही लम्बे समय के निवेशक भी खरीद रहे होते हैं। अपने यहां एकाध महीने से शायद कुछ ऐसा ही हो रहा है। लेकिन ऐसा ज्यादा नहीं चल सकता। इसका स्पष्ट संकेत देती है डेरिवेटिव सेगमेंट में इस्तेमाल की जा रही मार्केट वाइड पोजिशन लिमिट (MWPL), जो बराबर स्वीकृत सीमा के 12-15% के बीच ही झूल रही है। यह दिखाती है कि ट्रेडर अब भी पोजिशन लेने याऔरऔर भी

निवेश की दुनिया भांति-भांति के निवेशकों से भरी पड़ी है। निवेशक भी एक तरह के ट्रेडर हैं और ट्रेडर भी एक तरह के निवेशक। केवल साल-महीने और दिनों का ही तो फर्क है। ऊपर से आज समूची दुनिया के शेयर बाज़ार एक ही डोर में बंध चुके हैं। अमेरिका से निकला धन, वहां के शेयर बाज़ार से उठी लहर यूरोप, एशिया और ऑस्ट्रेलिया तक को अपने लपेटे में ले लेती है। अमेरिकी शेयर बाज़ार की गिरावट याऔरऔर भी

भारत में यूरोपीय देशों जैसी सामाजिक सुरक्षा होती तो आम लोगों को बचत के लिए मगज़मारी नहीं करनी पड़ती। ऊपर से वहां की सरकारें टैक्स का धन अवाम को संकट से बचाने के लिए खर्च करती हैं, जबकि अपने यहां सरकार हर आपदा में टैक्स बढ़ाने के अवसर खोजती है। कच्चे तेल के दाम पिछले आठ साल में बराबर घटते रहे। इधर बढ़ने के बावजूद 2014 से कम हैं। फिर भी हमारी सरकार ने पेट्रोल-डीज़ल व रसोईऔरऔर भी