चीन का औसत व्यक्ति भारत के औसत व्यक्ति से 5.4 गुना ज्यादा अमीर है। चीन अब जनसंख्या के मामले में भारत से पीछे जाता दिख रहा है। अभी उसकी आर्थिक विकास दर भले ही भारत से कम हो गई हो। लेकिन कभी वह कुलांचे भर रहा था। चीन का जीडीपी 1970 में 19.30% की अधिकतम दर से बढ़ा था, जबकि भारत की अधिकतम विकास दर 1988 में 9.63% ही रही है। चीन की विकास दर 22 सालोंऔरऔर भी

चीन व भारत दुनिया की दो सबसे बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाएं हैं। चीन दुनिया में दूसरे नंबर और भारत पांचवें नंबर की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। एशिया की बात करें तो भारत व चीन साथ मिलकर एशिया के जीडीपी में आधे से ज्यादा योगदान देते हैं। सोचने की बात है कि साल 1987 में भारत व चीन का जीडीपी लगभग बराबर था। लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि साल 2021 तक चीन भारत से 5.46 गुना बड़ी अर्थव्यवस्थाऔरऔर भी

पहले विश्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष 2023-24 में भारत की आर्थिक विकास दर का अनुमान 6.6% से घटाकर 6.3% किया। अब आईएमएफ (अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष) ने भी कह दिया है कि इस साल हमारा जीडीपी 6.1% के बजाय 5.9% ही बढ़ सकता है। फिर भी अगर रिजर्व बैंक विकास दर का अनुमान दो महीने में ही 6.4% से बढ़ाकर 6.5% कर दिया तो इसकी राजनीतिक वजह ही हो सकती है। मई 2024 में लोकसभा चुनाव होने हैंऔरऔर भी

सामान्य निवेशक के लिए शेयर बाज़ार में कोई सुरक्षित कोना पकड़ पाना बेहद कठिन है। हर तरफ इतना शोर, भ्रम, भारी-भरकम शब्दजाल और लूट-खसोट है कि वह घबरा कर छिटक जाता है। ट्रेडिंग की बात करें तो कहा जाता है कि 90% ट्रेडर इसमें घाटा खाते हैं। जो 10% घाटा नहीं खाते, वे इतना भी नहीं कमा पाते कि अपने परिवार के लिए औसत ज़िंदगी सुनिश्चित कर सकें। सालों-साल से यही सिलसिला चला आ रहा है। फिरऔरऔर भी

भारत की सबसे बड़ी ताकत विशाल प्राकृतिक व मानव संसाधनों के साथ उसकी उद्यमशीलता है। जीडीपी के आकार में हम भले ही दुनिया में पांचवें नंबर और प्रति व्यक्ति आय में 197 देशों की रैकिंग में 142वें पायदान पर हों, लेकिन स्टार्ट-अप्स की संख्या के मामले में हम समूची दुनिया में अमेरिका व चीन के बाद तीसरे स्थान पर हैं। भारत की यह मूलभूत ताकत उसे कहीं का कहीं पहुंचा सकती है। लेकिन इसका रोडमैप सोचने सेऔरऔर भी

पहले विश्व बैंक ने आगाह किया कि अगले कुछ सालो में विश्व अर्थव्यवस्था की विकास दर घटकर 2.2% पर आ सकती है। अब आईएमएफ ने भी आर्थिक सुस्ती की चेतावनी दे दी है। ऐसे में भारत अप्रभावित नहीं रह सकता। एचडीएफसी समूह के मुखिया और देश की मशहूर कॉरपोरेट हस्ती दीपक पारेख मानते हैं कि वैश्विक हालात को देखते हुए भारत की विकास दर आगे धीमी पड़ सकती है। उन्होंने बीते शनिवार को एक समारोह में कहाऔरऔर भी

विश्व बैंक का कहना है कि भारत की आर्थिक विकास दर चालू वित्त वर्ष 2023-24 में इसलिए कम रहेगी क्योंकि उधार महंगा होने और आमदनी में कम बढ़त से निजी उपभोग में कमी आएगी। लेकिन रिजर्व बैंक कहता है कि हमारा जीडीपी ज्यादा बढ़ेगा क्योंकि रबी की अच्छी फसल से ग्रामीण मांग बढ़ेगी, सरकार के ज्यादा पूंजीगत व्यय से मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में क्षमता इस्तेमाल का स्तर उठेगा, बैंक ऋण दहाई अंक में बढ़ रहे हैं और जिंसोंऔरऔर भी

रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष 2023-24 की पहली मौद्रिक नीति समीक्षा में बैंकों को दिए जानेवाले अल्पकालिक धन पर ब्याज दर या रेपो रेट को 6.5% पर जस का तस रखा है। लेकिन जीडीपी की विकास दर का अनुमान बढ़ाकर 6.5% कर दिया है। दो महीने पहले फरवरी में ही उसी ने 6.4% विकास दर का अनुमान लगाया था। आखिर फरवरी और अप्रैल के बीच ऐसा क्या हो गया कि रिजर्व बैंक को लगा कि हमारीऔरऔर भी

देश-दुनिया में बुरी खबरें आती ही रहती हैं। लेकिन भारत जैसे विकासशील देश की अर्थव्यवस्था अपनी संपूर्ण संभावना को हासिल करने की दिशा में बढ़ती रहती है। इसलिए यहां का शेयर बाज़ार भी बराबर बढ़ता रहता है। आज आपको जानकर आश्चर्य होगा कि 12 साल पहले अप्रैल 2011 में एनएसई निफ्टी 5550 और बीएसई सेंसेक्स 18,500 अंक के आसपास था। इन 12 सालों में तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद दोनों सूचकांक तीन गुना से ज्यादा बढ़ चुके हैं।औरऔर भी

वाणिज्य व उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने देश के निर्यात को 2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य तब रखा है, जब वैश्विक मांग मंद पड़ने से तीन महीनों से लगातार वो घट रहा है। ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक फरवरी में वो 8.82% घटा है। विश्व में आर्थिक सुस्ती या आसन्न मंदी और हमारे घटते निर्यात का असर अंततः यह हो सकता है कि अमेरिका से लेकर यूरोप और चीन व जापान तक की तमाम कंपनियां अपनाऔरऔर भी