अगर आप सोशल मीडिया पर ऑनलाइन या ऑफलाइन स्टॉक ट्रेडिंग सिखानेवालों के फंदे में फंस गए तो बहुत सारे जार्गन या जुमले ज़रूर सीख जाएंगे। लेकिन ट्रेडिंग के सार और अपने रिफ्लेक्सेज़ को कभी नहीं साध पाएंगे। ट्रेडिंग का सार यह है कि सारा खेल भावों के उतार-चढ़ाव का है और शेयरों के भाव धन के आगम और निकास से निर्धारित होते हैं। धन का प्रवाह धनात्मक है, खरीदनेवालों की दिलचस्पी ज्यादा और बेचनेवालों की कम हैऔरऔर भी

आजकल सोशल मीडिया पर शेयर बाज़ार में निवेश व ट्रेडिंग सिखानेवालों की बाढ़-सी आई हुई है। फेसबुक और यूट्यूब पर एक खोजो, दसियों के दीदार हो जाते हैं, वो भी अंग्रेज़ी ही नहीं बल्कि ढेर सारे हिंदी में सिखानेवाले दिख जाते हैं। कोई कुंदन, कोई अवधूत, कोई इन्वेस्टिंग डैडी। सबका दावा कि आपको शेयर बाज़ार का प्रोफेशनल ट्रेडर व स्मार्ट निवेशक बना देंगे। फीस भी हज़ार रुपए के अंदर। शेयर बाज़ार की बुनियादी बातें, अर्थव्यवस्था का इतिहास-भूगोल,औरऔर भी

शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग भी एक तरह का निवेश है और निवेश भी एक तरह की ट्रेडिंग। निवेश का मकसद भी अंततः मुनाफा कमाना होता है तो वह भी लम्बे समय की ट्रेडिंग है और ट्रेडिंग छोटे समय का निवेश। ट्रेडिंग में अब तक की सफलतम रणनीति है मोमेंटम ट्रेडिंग। जो स्टॉक्स लगातार बढ़ रहे हैं और बढ़ते ही जा रहे हैं, उन्हें हर डुबकी पर खरीद लेना काफी लाभ का सौदा होता हैं। अब तो निवेशऔरऔर भी

ऐसा कौन-सा वयस्क होगा जो नहीं जानता कि उसकी वित्तीय ज़रूरतें और सीमाएं क्या हैं? वह नहीं जानता तो यह कि कौन-से स्टॉक्स और म्यूचुअल फंड स्कीम्स में निवेश करे। वह यह भी नहीं जानता कि शेयर बाज़ार में निवेश या ट्रेडिंग का रिस्क क्या है और उसे कितना रिस्क लेना चाहिए कि उसकी लुटिया न डूब जाए। समस्या यह कि उसे यह ज्ञान करानेवाला कोई ईमानदार मंच अपने यहां नहीं है। कहने को जो विद्वान, इक्विटीऔरऔर भी

जापान के शेयर बाज़ार में नब्बे के दशक में आंख मूंदकर लम्बा निवेश करनेवाले लोग आज खून के आंसू रो रहे होंगे। वे अगर अपने देश की अर्थव्यवस्था की हालत से वाकिफ रहे होते तो उनकी यह स्थिति नहीं होती। लेकिन शेयर बाज़ार की चकाचौंध और टेक्निकल बातों में उलझे विद्वान कहते हैं कि ब्याज, राजकोषीय हालत, मुद्रास्फीति, कच्चे तेल की कीमत, आयात-निर्यात का संतुलन, क्वांटिटेटिव ईजिंग या नोट छापकर सिस्टम में डालने जैसी तमाम जानकारियां वऔरऔर भी

देश की अर्थव्यवस्था से शेयर बाज़ार की हालत कैसे सीधे-सीधे प्रभावित होती है, यह जानना है तो जापान का हाल देख लेना चाहिए। विद्वान लोग कहते हैं कि शेयर बाजार लम्बे समय यानी 10-20 साल में पक्का और अच्छा रिटर्न देता है। यह बात भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यकीनन सही है। लेकिन जापान जैसे विकसित देश के लिए नहीं। जापान कोई छोटा-मोटा देश नहीं है। वह दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। जर्मनी उससेऔरऔर भी

जिस शेयर बाज़ार में निवेश या ट्रेडिंग से हम कमाना चाहते हैं, वह हवा या किसी निर्वात में नहीं होता। उसका सीधा रिश्ता देश की अर्थव्यवस्था से होता है। आज ग्लोबल हो चुकी दुनिया में देश की अर्थव्यवस्था दुनिया की स्थिति से प्रभावित होती है। 2008 का वित्तीय संकट आया था अमेरिका में। पर उसने सारी दुनिया की चूलें हिलाकर रख दीं। फिर, वित्तीय जगत तो अमेरिका से लेकर यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया तक, दुनिया के इस कोनेऔरऔर भी

हिंदी पृष्ठभूमि से आने, मगर अंग्रेज़ी से कमानेवाले कुछ विद्वान बंधुओं का कहना है कि शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग व निवेश से कमाने की चाह रखनेवाले लोगों के लिए यह जानना कतई जरूरी नहीं है कि देश व दुनिया की अर्थव्यवस्था कैसी चल रही है? यूरोप व अमेरिका में आर्थिक मंदी के क्या आसार हैं, ब्याज दर बढ़ रही है या घट रही है या देश का डेमोग्रैफिक डिविडेंड क्या है, बेरोज़गारी व शिक्षा की क्या स्थितिऔरऔर भी

देश की अर्थव्यवस्था या जीडीपी बढ़ता है तो शेयर बाज़ार बढ़ता है। लेकिन ऐसा तुरत-फुरत नहीं होता। दोनों का रिश्ता सीधा नहीं, समय सापेक्ष है। कारण, जहां जीडीपी अतीत को दर्शाता है, वहीं शेयर बाज़ार भविष्य को सोचकर चलता है। भारत भले ही दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। लेकिन अंदर से इसकी हालत अच्छी नहीं है। फिर भी शेयर बाज़ार बढ़ रहा है क्योंकि भारत का भविष्य संभावनाओं से भरा हुआ है। भारत से बड़ीऔरऔर भी

सरकार की तरफ से कहा जाता है कि उसने 2014 में डूबने के कगार पर पहुंच चुकी देश की अर्थव्यवस्था को बचा लिया। निहित स्वार्थों के चलते सरकार से जुड़े देशी-विदेशी कॉरपोरेट संस्थान और अर्थशास्त्री तक बताने से नहीं थकते कि भारत को 2014 में नाज़ुक अवस्था में पहुंच चुकी दुनिया की पांच कमज़ोर अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता था, जबकि आज वह सबसे तेज़ गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। हकीकत यह है कि मार्च 2014 से मार्चऔरऔर भी