माना जाता है कि अर्थव्यवस्था बढ़ेगी तो रोज़गार के नए असर पैदा होंगे और काम करनेवालों को अपने श्रम का बेहतर दाम मिलेगा। लेकिन अपने यहां तो कबीर की उलटबांसियां ही चल रही हैं। वित्त वर्ष 2014-15 से 2021-22 तक हमारा जीडीपी 5.35% की औसत सालाना रफ्तार से बढ़ा है। लेकिन रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक इस दौरान वास्तविक मजदूरी 1% सालाना से भी कम दर से बढ़ी है। यह कृषि मजदूरों के लिए 0.9%, कंस्ट्रक्शनऔरऔर भी

एक बात हमें अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि हम कितनी भी मशक्कत कर लें, निवेश में सफलता रातोंरात नहीं मिलती। इसके लिए समय, अनुशासन व धैर्य की दरकार होती है। अगर आपको लगता है कि शेयर बाज़ार से खटाखट नोट कमाने का कोई फॉर्मूला है तो यह विचार फौरन जेहन से निकालकर दूर फेंक दें। साथ ही हमें निवेश और सट्टेबाज़ी के अंतर को साफ समझ लेना चाहिए। शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग एक तरह का सट्टाऔरऔर भी

भारत जैसा शानदार डेमोग्रैफिक डिविडेंड वाला देश अगर अपनी पूरी श्रमशक्ति का उपयोग नहीं कर रहा है तो अर्थव्यवस्था अपनी संपूर्ण संभावना कतई नहीं हासिल कर सकती। हम दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने का दम भरते हैं। लेकिन ‘द इकनॉमिस्ट’ पत्रिका के मुताबिक दुनिया में केवल नौ देश हैं जहां बेरोज़गारी की दर भारत से ज्यादा है। ये देश हैं ग्रीस, इटली, स्पेन, तुर्किए, ब्राज़ील, चिली, कम्बोडिया, मिस्र व सऊदी अरब। वो भी तब, जबऔरऔर भी

इतनी विपुल श्रमशक्ति वाले भारत में श्रम की इतनी उपेक्षा क्यों? अपने यहां अमेरिका या अन्य विकसित देशों की तरह ज्यादातर लोग रोज़गार दफ्तरों से काम मांगने नहीं जाते। फिर भी सीएमआईई (सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी) के मुताबिक देश में इस वक्त करीब 5 करोड़ लोग काम करने को उत्सुक हैं, मगर उन्हें काम नहीं मिल रहा। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देश में 2017-18 में बेरोजगारी की दर 6.1% के साथ 45 सालों के उच्चतम स्तरऔरऔर भी

जिस देश की 68% या दो-तिहाई आबादी 15 से 64 साल, एक चौथाई या 25% आबादी 14 साल तक के बच्चों की हो और महज 7% आबादी 65 साल से ऊपर के बूढ़ों की है, वह बेहद भाग्यशाली है। बच्चे तो परिवार के साथ पल जाते हैं, जबकि बूढ़ों को कामकाज़ी लोगों द्वारा पालना होता है। भारत सरकार ने सामाजिक सुरक्षा से पल्ला झाड़ रखा है या बीमा कंपनियों के मत्थे मढ़कर बाज़ार के हवाले कर दियाऔरऔर भी

उत्पादन के चार कारक हैं भूमि, श्रम, पूंजी व उद्यमशीलता। इनके मिलने से ही वे तमाम माल व सेवाएं बनती हैं जिनसे हमारी अर्थव्यवस्था बनती है। इनमें से पूंजी, उद्यमशीलता और भूमि की चर्चा जमकर होती है। लेकिन उत्पादन व अर्थव्यवस्था में अहम योगदान करनेवाले श्रम को किनारे कर दिया जाता है। हम भी 1 मई को महाराष्ट्र दिवस और गुजरात दिवस मनाने के चक्कर में अक्सर भूल जाते हैं कि यह अंतरराष्ट्रीय श्रम दिवस या मईऔरऔर भी

अनिश्चितता से भरी दुनिया है तो धंधे में भी ऊपर-नीचे चलता रहता है। कभी तेज़ तो कभी मंदा। कंपनियों के शेयर सीधे-सीधे उसके धंधे से प्रभावित होते हैं तो अगर उसमें ऑपरेटर सक्रिय न हों तो धंधे के मंदा पड़ते ही शेयर भी ठंडे पड़ने लगते हैं। ऐसे में लम्बे समय के निवेशक को क्या करना चाहिए? नियम व समझदारी कहती है कि अगर किसी भी वजह से कोई शेयर हमारे खरीद मूल्य से 25% तक गिरऔरऔर भी

हमारा मौसम विभाग अल-निनो के आसन्न खतरे से भले ही इनकार कर रहा है। लेकिन सारी दुनिया में इसको लेकर हाहाकार मचा हुआ है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) की एक रिपोर्ट के मुताबिक अन-निनो से के उपजी असामान्य गरमी से आमतौर पर ठंडे रहनेवाले यूरोप में बीते साल 2022 के दौरान 15,000 लोगों की मौत हो गई। भारत में अभी जबरदस्त गरमी की लहर चल रही है। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु में होऔरऔर भी

अल-निनो मध्य प्रशांत महासागर में तापमान के बढ़ने की एक चक्रीय परिघटना है। भारत पर इसके आने का असर यह होता है कि दस सालों में से छह साल में देश के पश्चिमी, उत्तर-पश्चिम व मध्य-भारत के पश्चिमी हिस्से में कम बारिश होती है। साल 1951 से 1922 तक के 71 सालों में 15 साल अल-निनो के रहे हैं। इस दौरान मध्य व भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में तापमान आधा डिग्री सेल्सियस से ज्यादा बढ़ गया। इससे नौऔरऔर भी

हमारे मौसम विभाग का तर्क है कि यकीनन अल-निनो की तलवार इस बार के मानसून के सिर पर अटकी है। लेकिन कुछ कारक उसके असर को निष्क्रिय कर सकते हैं। इसमें से एक प्रमुख कारक हिंद महासागर का डाइपोल (आईओडी) है। इसके अंतर्गत होगा यह कि अरब सागर में तापमान गरम थोड़ा रहेगा। इससे अगस्त से सितंबर तक भारत में नमी ज्यादा रहेगी और भरपूर बारिश होगी। इससे अल-निनो का असर काफी कम हो जाएगा। केंद्र सरकारऔरऔर भी