जमकर टैक्स और टैक्स से भिन्न राजस्व पाने के बावजूद केंद्र सरकार इस बार वित्तीय अनुशासन की लक्ष्मण रेखा से बाहर निकल जाएगी। चालू वित्त वर्ष 2023-24 के बजट में अनुमान लगाया था कि राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 5.9% तक सीमित रखा जाएगा। अगर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आंकड़ों की कोई हेराफेरी नहीं की तो यह घाटा जीडीपी के 6% के पार जा सकता है। यह 5.9% की बजट प्रतिबद्धता को तभी मान सकता है,औरऔर भी

बजट पेश करने से पहले वित्त मंत्री बड़ी खुश होंगी क्योंकि सरकार के खजाने में जमकर टैक्स आ रहा है। असल में यह नौ साल से चल रही इस सरकार की इकलौती सबसे बड़ी कामयाबी है। बाकी सब महज झांकी है, दिखावा है। 10 जनवरी तक रिफंड को घटाकर सरकार के पास 14.7 लाख करोड़ रुपए का प्रत्यक्ष टैक्स आ चुका था। यह साल भर पहले से 19.41% ज्यादा है और पूरे चालू वित्त वर्ष के लक्ष्यऔरऔर भी

इस हफ्ते गुरुवार, 1 फरवरी को सरकार नए वित्त वर्ष 2024-25 का अंतरिम बजट पेश करने जा रही है। चुनाव के ठीक पहले का बजट किसी आम बजट से भी ज्यादा अहम हो सकता है क्योंकि तब सरकार अवाम को थोड़ा ज्यादा याद रखती है। टैक्स नहीं लगा सकती। हालांकि गरीब नवाज़ होने का हल्ला खूब मचाएगी। मीडिया अगले चार-पांच दिन तक बजट को लेकर पगलाया रहेगा। वो क्या कहेगा, इसका आसानी से अनुमान लगाया जा सकताऔरऔर भी

अपने शेयर बाज़ार में अच्छी कंपनियों की कमी नहीं। एक ढूंढो, हज़ार मिल जाती हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि लगभग सारी की सारी अच्छी कंपनियां हाथ से निकल चुकी हैं। उनके शेयर इस वक्त आसमान से बातें कर रहे हैं। इनमें से पांच-दस दिन की ट्रेडिंग तो की जा सकती है। लेकिन लम्बे समय के लिए इन्हें खरीदना फालतू का जोखिम उठाना है। जोखिम भी उठाओ और कायदे का रिटर्न भी न मिले तो क्या फायदा!औरऔर भी

गणतंत्र, संविधानप्रदत्त अधिकारों से सम्पन्न नागरिकों का देश। अंग्रेज़ों द्वारा गुलामी के दौरान मॉरीशस लेकर सूरीनाम और दूसरे देशों में बसाए भारतीय वापस लौटकर नहीं आए तो बात समझ में आती है। खाड़ी के देशों में गए कामगार वापस मुल्क नहीं लौट रहे तो वजह साफ है। लेकिन आज जिस तरह गरीब व बेरोज़गार नौजवान ठगों और बिचौलियों का शिकार बनकर भी विदेश जाने को लालायित हैं, प्रोफेशनल अपनी बिकाऊ प्रतिभा के दम पर वर्क वीज़ा हासिलऔरऔर भी

पिछले एक दशक में देश छोड़कर बाहर भाग रहे गरीबों, नौजवानों, प्रोफेशनल्स और अमीरों की संख्या बहुत तेज़ी से बढ़ी है। खुद विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संसद में 21 जुलाई 2023 को बताया था कि 2022 में कुल 2,25,260 भारतीयों ने अपनी भारतीय नागरिकता छोड़ी है। 2020 में यह संख्या 85,256 थी। दो साल में ढाई गुना से ज्यादा! वित्त वर्ष 2011-12 से लेकर 2022-23 तक कुल 16,63,440 भारतीयों ने अपनी नागरिकता छोड़ी है। बीते सालऔरऔर भी

जो सत्ता के रंग में नहीं रंग सकते, दलाली नहीं कर सकते, छद्म राष्ट्रवाद का उम्माद नहीं फैला सकते हैं और भारत से बाहर दुनिया में कहीं सेटल हो सकते हैं, उनमें से ज्यादातर लोग देश छोड़कर भाग रहे हैं। इनमें बड़ी तादाद एचएनआई (हाई नेटवर्थ इंडीविजुअल्स) या अति अमीर लोगों की है। ये लोग बाहर बसने के लिए गोल्डन वीसा खरीद रहे हैं। लंदन की वैश्विक नागरिकता व आवास सलाहकार फर्म हेनली एंड पार्टनर्स की एकऔरऔर भी

जो कभी नहीं हुआ, वो अभी हो रहा है। शुक्रवार, 12 मार्च 1993 को जब सुबह से ही मुंबई बम धमाकों से थर्रा रही है, पूरी मुंबई में 257 लोग मारे गए और 1400 से ज्यादा घाटल हो गए, दोपहर डेढ़ बजे बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के बेसमेंट तक में जबरदस्त धमाका हुआ, तब भी अपना शेयर बाजार बंद नहीं हुआ था और उसमें सोमवार 15 मार्च से बाज़ार में बाकायदा ट्रेडिंग होने लगी। बुधवार, 26 मार्च 2008औरऔर भी

शेयर बाज़ार के निवेशकों का साबका बार-बार ‘वैल्यू’ से पड़ता है। वॉरेन बफेट का मशहूर वाक्य है कि ‘प्राइस’ वो है जो आप देते हो और ‘वैल्यू’ वो है जो आप पाते हो। अंग्रेज़ी में पारंगत लोग भले ही इसका अर्थ और मर्म समझ लें। लेकिन हिंदी या अन्य भारतीय भाषाएं बोलने-समझने वाले लोगों को इसमें काफी दिक्कत होती है। प्राइस का अनुवाद कीमत, दाम या भाव हो सकता है और वैल्यू को हम मूल्य कह सकतेऔरऔर भी

पिछले 10-12 साल से देश में गुजरात के आदर्श मॉडल का हल्ला चल रहा है। लेकिन पिछले माह निकारागुआ के रास्ते अमेरिका भागने की जुगत में लगे 303 नौजवानों में से सबसे ज्यादा 65 युवा गुजरात के थे। इन्हीं में मेहसाणा के एक युवक का कहना था, “यहां तो केवल उन्हीं को सरकारी नौकरी मिलती है जो पैसा खिलाते हैं या जिनकी तगड़ी पहुंच है। प्राइवेट में कायदे का पैसा नहीं मिलता। इसलिए भारत में रहकर हमेशाऔरऔर भी