राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्कारों में पले-पढ़े नरेंद्र मोदी जैसे प्रचारक भले ही सत्यमेव जयते के राष्ट्रीय आदर्श वाले देश भारत के प्रधानमंत्री बन जाएं, लेकिन वे झूठ बोलने और लम्बी फेंकने से बाज नहीं आते। मोदी कितना भी कहते रहें कि भारत को 22 साल में निम्न मध्यम आय के स्तर से उठाकर 2047 तक विकसित देश बना देंगे, मगर इतिहास साक्षी है कि पिछले 80 साल में दुनिया का कोई भी देश अपने स्तर कोऔरऔर भी

भारत साल 2007 में ही 1022 डॉलर प्रति व्यक्ति आय के साथ निम्न मध्यम आय का देश बन गया था। 18 साल बाद 2025 में भी वो 2698 डॉलर प्रति व्यक्ति आय के साथ निम्न मध्यम आय का ही देश है। अमर्त्य सेन जैसे कुछ प्रखर अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अगर कोई देश 28 साल तक निम्न मध्यम आय की श्रेणी में फंसा रह जाता है तो इस ट्रैप से उसका निकल पाना असंभव नहीं तोऔरऔर भी

सेवाओं के निर्यात पर तो ऐसा माहौल बनाया जाता है कि भारत सचमुच दुनिया का बैक-ऑफिस बन चुका है और वो सेवाओं के निर्यात का पावरहाउस है। लेकिन इसमें भी विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र व्यापार व विकास संगठन (अंकटाड) की रैंकिंग सारा भ्रम तोड़ देती है। प्रति व्यक्ति सेवाओं के निर्यात की रैंकिंग में भारत दुनिया के 114 देशों में 89वें स्थान पर है। वो मलयेशिया, तुर्किए और थाईलैंड से भी नीचे है। कोई कह सकताऔरऔर भी

देश में करीब 11 साल से चल रहा मोदीराज खांटी हवाबाज़ी का पर्याय बन गया है। इस हवाबाज़ी के लम्बरदार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। बाकी तमाम मंत्री, मुख्यमंत्री और बड़े-बड़े अधिकारी उनके दरबारी हैं। उनकी बातों और दावों का वास्तविकता से कोई लेना-लेना नहीं। संसद में बात सुनी नहीं जाती। अदालतें और न्यायाधीश जस्टिस लोया की प्रेतबाधा से ग्रस्त हैं। मीडिया सत्ता के साथ ऐसा नाभिनाल बद्ध है कि सरकार के खिलाफ बोल नहीं सकता। अधिकांश जनताऔरऔर भी

आम निवेशकों का कोई खास नहीं, कोई अपना नहीं। उन्हें नहीं पता कि जिन्हें वे खास व सगा समझते हैं, वे असल में उनका ही शिकार करने बाज़ार में उतरे हैं। बिजनेस चैनलों, अखबारों और कुकुरमुत्तों की तरह उग आए वेबपोर्टलों के विशेषज्ञों व सलाहकारों की मुफ्त सलाहों पर वे लहूलोह होते रहते हैं। ऐसे विशेषज्ञों को निवेश का भगवान मानते हैं। उनकी सलाह मान शेयर खरीदते हैं। लेकिन अक्सर दुखी रहते हैं कि जब भी वेऔरऔर भी

मीडिया को खरीदा जा चुका है। असली अर्थशास्त्री सरकार से बाहर हॆ। नकली अर्थशास्त्रियों की भरमार है। छह साल तक रिजर्व बैंक में सरकार की दासता करनेवाले शक्तिकांत दास को सेवानिवृति के बाद सीधे प्रधानमंत्री का दूसरा प्रधान सचिव बना दिया गया है। ऐसे में प्रधानमंत्री से लेकर मंत्री व मुख्यमंत्री सभी हांके जा रहे हैं। उत्त्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ महाकुंभ से राज्य के जीडीपी में 3.5 लाख करोड़ रुपए जोड़ने के दावे से पहलेऔरऔर भी

अर्थनीति जब राजनीति की सेवा का साधन बन जाए तो आर्थिक उन्नति व विकास के सारे वादे खोखले नारे बन जाते हैं। देश के जो राज्य आज केंद्र की राजनीति में हाशिए पर हैं, वे प्रति व्यक्ति आय के मामले में सबसे ऊपर है। दरअसल, उन्होंने शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य व जनसंख्या नियंत्रण में शानदार काम किया है। इस समय जहां देश की प्रति व्यक्ति आय 2698 डॉलर है, वहीं तेलंगाना की प्रति व्यक्ति आय 4306 डॉलर,औरऔर भी

नीति आयोग के लक्ष्य के मुताबिक 2047 में देश को सतही स्तर पर मुद्रास्फीति के झाग समेत 18,000 डॉलर प्रति व्यक्ति आय का लक्ष्य हासिल करना है तो इसे अगले 22 सालों तक 9.01% की सालाना चक्रवृद्धि दर (सीएजीआर) से बढ़ना होगा और मुद्रास्फीति के झाग के बिना यह लक्ष्य हासिल करना है तो इस दौरान 11.85% की सीएजीआर से बढ़ना होगा। औसतन 6-6.5% की वृद्धि दर वाला देश कैसे यह असंभव चमत्कार कर दिखाएगा, यह मानवऔरऔर भी

भारत को विकसित देश बनाना अब कोई कार्यक्रम नहीं, बल्कि मार्केटिंग का पैंतरा बनकर रह गया है। सरकार या सरकारी संस्थानों को जो कुछ बेचना है, उसे विकसित भारत के रैपर में लपेट देते हैं। यहां तक कि भारतीय स्टेट बैंक ने कुछ हफ्ते पहले अपने म्यूचुअल फंड के लिए ₹250 प्रति माह की एसआईपी ‘जननिवेश – जन जन का निवेश’ स्कीम लॉन्च की तो उसकी भी टैगलाइन बना दी कि विकसित भारत की यात्रा का हिस्साऔरऔर भी

हम अक्सर शेयरों के उठने-गिरने की माया में ऐसे खो जाते हैं कि उनसे जुड़ी कंपनियों के प्रबंधन की तरफ देखते ही नहीं। आज के दौर में कहीं ज्यादा ज़रूरी हो गया है कि हम ऐसी ही कंपनियों को निवेश के लिए चुने, जिनका प्रबंधन शेयरधारकों के लिए बराबर मूल्य-सृजन करता रहा है। हाल में दुनिया के सफलतम निवेशक वॉरेन बफेट ने अच्छे प्रबंधन के कुछ आम मानदंड बताए हैं। उसी प्रबंधन पर भरोसा करें जो अपनीऔरऔर भी