आज के जमाने में अतीत की धौंस का कोई मतलब नहीं है। आप क्या थे या क्या रह चुके हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मायने यह रखता है कि आप अभी क्या हैं और आगे क्या हो सकते हैं।और भीऔर भी

हमारे देश के अधिकांश लोगों की तरह ही हैं दयाकृष्ण जोशी। किस्मत में भरोसा करते हैं। कहते हैं – अरे यार, भविष्य की क्या चिंता करना? जो होगा देखा जाएगा। एक आईटी कंपनी में कार्यरत जोशी का सोचना सही भी है। भारी वेतन। सुखी परिवार। स्नेहिल बीवी, दो प्यारे-प्यारे बच्चे – 8 साल की लडक़ी व 6 साल का लडक़ा। बच्चों के भविष्य हेतु: लेकिन पिछले साल एक हादसे में अपने 30 साल के एक रिश्तेदार कीऔरऔर भी

भूत, वर्तमान और भविष्य की अनुभूति के बीच सही संतुलन जरूरी है। अतीत मिट जाए तो हम शब्दहीन, वर्तमान खो जाए तो अवसादग्रस्त और भविष्य न दिखे तो निर्जीव मशीन बन जाते हैं।और भीऔर भी

कल किसने देखा है? लेकिन अगर हम अतीत को जान लें। वहां से वर्तमान तक के सफर का ग्राफ समझ लें तो कल का खाका बनने लगता हैं। भविष्य की अनिश्चितता का जोखिम पकड़ में आने लगता है।और भीऔर भी

पैर वर्तमान में और नापते हैं भविष्य को! कैसे संभव है? हम बहकने लगते हैं कि ये होगा तो वो करेंगे, ऐसा होगा तो वैसा करेंगे; जबकि तैयारी यह होनी चाहिए कि ये हुआ तो क्या करेंगे, वो हुआ तो क्या करेंगे।और भीऔर भी

जो धारा की सतह को देखते-समझते हैं, आज उनका है। लेकिन जो सतह के नीचे चल रही अंतर्धाराओं को अभी से देख लेते हैं, कल उन्हीं का है। भविष्य कहीं आसमान से नहीं टपकता। वह वर्तमान के गर्भ से ही उपजता है।और भीऔर भी

यहीं थोड़ी दूर कहीं हमारा बचपन खेल रहा होगा। पड़ोस में कहीं हमारा बुढ़ापा खांस रहा होगा। देखना चाहें तो अपना अतीत व भविष्य अपने ही इर्दगिर्द देख सकते हैं। हम क्या थे, क्या बनेंगे, समझ सकते हैं।और भीऔर भी

हम सभी अपने वर्तमान से दुखी, अतीत पर मुग्ध और भविष्य को लेकर डरे हुए क्यों रहते हैं? क्या हम आज को लेकर मगन, बीत चुके पल के प्रति निर्मम और आनेवाले कल को लेकर बिंदास नहीं हो सकते?और भीऔर भी

आज के जरूरी खर्च हम कल पर नहीं टाल सकते और कल का निवेश आज रोक नहीं सकते क्योंकि उपभोग तो आज की जरूरत पूरा करने के लिए ही है जबकि निवेश आज की नहीं, कल की सोचकर आज किया जाना है।और भीऔर भी

गंजे को कंघी का क्या जरूरत और बच्चों को जीवन बीमा की क्या जरूरत? लेकिन जीवन बीमा कंपनियां अभी तक यूलिप के जरिए ऐसा ही करती रही हैं। खरीदनेवाला शुरू में एजेंट के झांसे में रहता है कि कैसे कुछ साल तक दिया गया 25-30 हजार रुपए का सालाना प्रीमियम बच्चे के बड़े होने पर एक-डेढ़ करोड़ में बदल जाएगा। बाद में होश आता है कि अरे, यह तो हमारे बच्चे का जीवन नहीं, मृत्यु बीमा बेचकरऔरऔर भी