संविधान कोई कविता, कहानी या उपन्यास नहीं है जिसे कोई एक व्यक्ति अपने दम पर लिख सके। लेकिन अपने यहां दलितों की मासूम भावनाओं को फायदा उठाने के लिए ऐसा राजनीतिक पाखंड खड़ा किया गया है कि हर किसी की बोलती बंद है।और भीऔर भी

इंसान और विपक्ष का असली चरित्र तभी खुलता है जब उसे सत्ता मिलती है। तभी पता चलता है कि वो कितना संत था और कितना ढोंगी, उसकी बातों में कितनी लफ्फाजी थी और कितनी सच्चाई। संत तो सत्ता पाकर भी सृजनरत रहता है।और भीऔर भी

कानून ही लंबे समय में व्यापक सामाजिक स्वीकृति पाने के बाद नैतिकता बन जाते हैं। फिर भी नैतिकता सर्वकालिक नहीं होती। किसी नैतिक मानदंड के सही होने का एक ही पैमाना है कि वह व्यापक समाज के वर्तमान व भावी हित में है या नहीं।और भीऔर भी

स्वार्थ पर टिकी इस दुनिया में भी लोग परमार्थी हो सकते हैं। लेकिन कोई हमारा इतना हितैषी क्यों बन रहा है? दूसरे की सलाह पर गौर करते हुए हमें खुद से यह सवाल जरूर पूछना चाहिए। अपने स्वार्थ की साफ समझ इसी तरह से बनती है।और भीऔर भी

किसी इंसान के बुद्धिमान या धनवान होने का मतलब यह नहीं कि उसने अपनी पशु-वृत्तियों पर काबू पा लिया है; बल्कि सत्तावान होते ही उसकी पशु-वृत्तियां और प्रबल हो जाया करती हैं। केवल ज्ञानवान ही पशु-वृत्तियों का शमन कर पाते हैं।और भीऔर भी

काश! हम उतना ही पैदा करते, जितना वाकई आवश्यक है। लेकिन मुनाफा बढ़ाते जाने के इस दौर में अनावश्यक चीजें बनाई और ग्राहकों के गले उतारी जा रही हैं। इससे वो प्राकृतिक संपदा छीझती जा रही है जो फिर कभी वापस नहीं आएगी।और भीऔर भी

शब्दों का शोर है, घटाटोप है। अर्द्धसत्य का बोलबाला है। हर कोई अपने स्वार्थ के हिसाब से सत्य को परिभाषित करने में जुटा है। ऐसे में निरपेक्ष सत्य क्या है? बहुजन के हितों का पोषक सत्य क्या है? यह खुद बहुजन को ही खोजकर निकालना होगा।और भीऔर भी

सोते हुए को जगाना आसान है, जगते हुए को जगाना मुश्किल। लेकिन जो लोग जागते हुए भी सोते रहते हैं, वे किसी और का नहीं, अपना ही नुकसान करते हैं। असहज अवस्था में होने के कारण फालतू चीजें भी उनके लिए घातक बन जाती हैं।और भीऔर भी

ये सृष्टि एक मिलीजुली कोशिश का नतीजा है। सूक्ष्म से सूक्ष्म कणों ने भी नियमबद्ध होकर बेहद तार्किक तरीके से इसको रचने में अपना भरपूर योगदान दिया है। ये दुनिया, ये ब्रह्माण्ड इसी कोशिश और कुछ प्राकृतिक नियमों का उद्घोष भर है।और भीऔर भी

आज के जमाने में सच्ची देशभक्ति का मतलब है उन लोगों को बेनकाब करना जो राष्ट्र की संपदा की निजी लूट में शामिल हैं। वे राष्ट्रद्रोही हैं जो जनता से मिले टैक्स या राष्ट्र के नाम पर लिए गए कर्ज का अपव्यय कर दलालों की तिजोरी भर रहे हैं।और भीऔर भी