आम या रिटेल निवेशकों के लिए शेयर बाज़ार में सीधे निवेश का सूत्र इसमें छिपा है कि कैसे छोटी कंपनियों को तब पकड़ लिया जाए, जब उन पर बड़े निवेशकों की नज़र न पड़ी हो। वैसे भी छोटी कंपनियों को म्यूचुअल फंड या विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक आईपीओ के बाद अमूमन हाथ नहीं लगाते क्योंकि उनकी खरीद इतनी बड़ी होती है कि छोटी कंपनियों के शेयर अचानक चढ़ जाते हैं। इसलिए छोटी और संभावनामय कंपनियां दौलत बनाने केऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में अक्सर ऐसा कुछ होता रहता है जो पहले कभी नहीं हुआ। इसलिए दुनिया की तरह शेयर बाज़ार को भी स्थिर व शाश्वत नियमों से चलनेवाला तंत्र मान लेना गलत है। आज तक ऐसा नहीं हुआ कि आईपीओ के बाद लिस्ट होने से पहले ही किसी कंपनी के शेयरों को बेचने की सलाह या सेल-कॉल दे दी जाए। लेकिन भारत ही नहीं, दुनिया में वोल्यूम के आधार पर सबसे बड़े डेरिवेटिव एक्सचेंज एनएसई के साथऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में धन का प्रवाह बढ़ता है तो सूचकांक से लेकर अलग-अलग स्टॉक्स तक बढ़ने लगते हैं। धन का प्रवाह सूखते ही सारी तेज़ी हवा हो जाती है। सितंबर 2024 के बाद विदेशी पोर्टफलियो निवेशकों (एफपीआई) के निकलने जाने से हमारे शेयर बाज़ार की यही दशा-दिशा चल रही है। एफपीआई झूमकर लौटे नहीं तो अपना शेयर बाज़ार एक कदम आगे, दो कदम पीछे चलता रहेगा। ऐसा नहीं कि विदेशी निवेशक भारत से चिढ़कर भाग रहे हैं।औरऔर भी

पश्चिम एशिया के संकट से उपजी अनिश्चितता काफी हद तक खत्म हो चुकी है। प्रति बैरल कच्चे तेल के दाम 100 डॉलर के पार जाने के बाद 70 डॉलर के आसपास डोल रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दावा कर रहे हैं कि उन्होंने सदी के सबसे बड़े संकट को रणनीतिक फैसलों और राजनय से निपटा दिया। लेकिन क्या भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सब कुछ सामान्य हो गया है? क्या हमारा शेयर बाज़ार उसी तरह बम-बम करेगा, जैसाऔरऔर भी

भारतीय शेयर बाज़ार में पंजीकृत निवेशकों की संख्या 25 करोड़ के पार जा चुकी है। इनमें से अलग-अलग पैन नंबर वाले निवेशकों की संख्या 13.1 करोड़ के आसपास है। इनमें से कम से कम 12 करोड़ निवेशक आम और 1.1 करोड़ निवेशक खास होने चाहिए। जब आम निवेशक आईपीओ या सीधे बाज़ार से शेयर खरीदते हैं तो सामने से ज्यादातर खास निवेशक बेचते हैं। खास निवेशकों में तमाम विदेशी निवेशक होते हैं जो वेंचर कैपिटल और प्राइवेटऔरऔर भी

स्पेसएक्स के आईपीओ से पहले एलन मस्क की नेटवर्थ 813 से 970 बिलियन डॉलर थी। आईपीओ आने के बाद उनकी नेटवर्थ 1.1 से 1.3 ट्रिलियन डॉलर हो गई और वे दुनिया के पहले ट्रिलियनर बन गए। 11 जून को आईपीओ में स्पेसएक्स के शेयर 135 डॉलर मूल्य पर जारी हुए। हालांकि इसका अंतर्ऩिहित मूल्य 63 डॉलर ही बताया जाता है। 12 जून को आईपीओ बंद होने तक इसमें लाखों छोटे निवेशकों और हज़ारों बड़े संस्थागत निवेशकों नेऔरऔर भी

ईरान युद्ध अंततः खत्म होने जा रहा है। होर्मुज़ स्ट्रैट से कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति जल्दी ही बहाल हो जाएगी। कच्चे तेल के दाम 80-85 डॉलर प्रति बैरल पर आ चुके हैं। शेयर बाजार फिर से उछलने के मुहाने पर है। बाज़ार में उत्साह लौटने लगा है क्योंकि 15 हफ्तों के चल रहा कंटक अब कटने को है। लेकिन इस दौरान जो शेयर बाज़ार से सब बेच-बाचकर निकल लिए, उनके लिए पछताने का दौर है।औरऔर भी

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद बड़ी आशा व उम्मीद के साथ भारतीय शेयर बाज़ार में वित्त वर्ष 2015-16 से 2023-24 तक शुद्ध रूप से 50.5 अरब डॉलर का निवेश किया। इसमें से अकेले 37.03 अरब डॉलर का शुद्ध निवेश उन्होंने कोरोना महामारी के दौरान वित्त वर्ष 2020-21 में किया। उसके बाद धीरे-धीरे उनकी आशा निराशा में बदलती गई। वो भी तब, जब 2022-23 को आधार वर्ष बनाने के बादऔरऔर भी

निवेश हमेशा भविष्य के लिए किया जाता है, अभी के लिए नहीं। यह भविष्य दो-चार साल से लेकर 10-20 साल भी हो सकता है। लेकिन भविष्य में क्या होगा, यह कोई अभी से जान या बता नहीं सकता। ऐसे में पत्र-पत्रिकाएं और ब्रोकर, सब-ब्रोकर और एजेंट टाइप लोग ऐसी कंपनियों के शेयर खरीदने को कहते हैं जो पहले से काफी बढ़े हुए हैं। लोगबाग भी लालच में इनके झांसे में आ जाते हैं। लेकिन सवाल उठता हैऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में जबरदस्त निराशा का आलम है। बहुत सारे बड़े-बड़े निवेशकों को लगता है कि अब भारत की विकासगाथा का अंत हो गया है। इसकी तात्कालिक वजह जहां पश्चिम एशिया में चल रही उथल-पुथल और ऊर्जा सुरक्षा पर छाया संकट है, वहीं स्थाई वजह मोदी सरकार की स्वार्थी व सत्ता केंद्रित राजनीति है। देश की सत्ता पर संघ व भाजपा का शिकंजा कसता जा रहा है। मगर अर्थव्यवस्था की हालत चॉक के टुकड़े जैसी भंगुर होतीऔरऔर भी