जब आप सिर्फ जिए चले जाते हो तो आप मन व शरीर के गुलाम होते हो। जब आप सोचकर जीते हो तब आप मन व शरीर के सारथी होते हो। जब आप लीक से हटकर जीते हो तो आप दृष्टा बन जाते हो।और भीऔर भी

एक टूटा-सताया हुआ मन, जो सारे कलह-क्लेश से भागना चाहता है, वो अनुशासन व नियमों से बंधकर काठ जैसा जड़ हो जाता है। लेकिन जो मजा जंगली घोड़ों की सवारी में है, वह काठ के घोड़ों में कहां?और भीऔर भी

शिव है तो शक्ति है। धरती है तो गुरुत्वाकर्षण है। शरीर है तो मन है। मन को निर्मल रखना है तो पहले शरीर को सहज व शुद्ध रखना जरूरी है। बाद में मन भी शरीर को साधने में मदद करता है।और भीऔर भी

हाथ फैलाते जाइए, लोगों से जुड़ते जाइए, नेटवर्क बनाते जाइए। यह विकास का क्षैतिज तरीका है। लेकिन मन से जुड़ना और मन से बढ़ना है तो इंसान के अपने अंदर का ऊर्ध्व विकास जरूरी है।और भीऔर भी

शरीर को साधकर पहलवान बना जा सकता है और मन को साधकर वैज्ञानिक। लेकिन अनहद का उल्लास दोनों ही नहीं पा सकते। यह तो उन्हीं को मिलता है जो तन और मन दोनों को साधते हैं।और भीऔर भी

उबलते पानी में देखी छवि को सही कैसे मान लेते हो भाई? मन को शांत करो। गुस्से से बाहर निकलो। गुस्से से उबलती अपनी छवि के दर्शन करो। तभी जाकर असली छवि को देख पाएंगे आप।और भीऔर भी

स्थिर शरीर से प्राण स्थिर होते हैं। स्थिर प्राण से बु्द्धि स्थिर होती है। स्थिर बुद्धि मन को संयत करती है। संयत मन चित्त को शांत करता है। शांत चित्त से ध्यान और ध्यान से योग सधता है।और भीऔर भी

मन में आए भाव-विचार के माफिक शरीर रसायन बनाता है और शरीर में पहुंचे रसायन मन को घुमा डालते हैं। फिर, रसायन तो रक्त के साथ पोर-पोर तक जाता है तो मन भी हर पोर तक पहुंच जाता होगा!और भीऔर भी

मंजिल दूर है। सफर लंबा है। चढ़ाई तीखी है। फिर इतना भारी बोझ क्यों? ईर्ष्या-द्वेष, दुश्मनी, बदला, देख लेंगे, निपट लेंगे। मन में इतना कचरा! अरे, फेंकिए ये बोझ और मुक्त मन से उड़ जाइए।और भीऔर भी

तन है, मन है और आत्मा भी है। पदार्थ और चेतना के अलग-अलग स्वरूप हैं। आपस में ऐसे जुड़े हैं कि अलग हो ही नहीं सकते। एक के खत्म होने पर दूसरा खल्लास। इसलिए इन तीनों को स्वस्थ रखना जरूरी है।और भीऔर भी