कॉरपोरेट क्षेत्र में बहस छिड़ी है कि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह देश के लिए वरदान हैं या अभिशाप। देश की सबसे बड़ी हाउसिंग फाइनेंस कंपनी, एचडीएफसी के प्रमुख दीपक पारेख जैसे दिग्गज कहते हैं कि डॉ. सिंह के रूप में हमें अब तक के सबसे अच्छे प्रधानमंत्री मिले हैं। वे एकदम बेदाग राजनेता हैं। इसलिए देश के वरदान हैं। वहीं दूसरा पक्ष कहता है कि डॉ. सिंह भले ही स्वच्छतम छवि के नेता हों, लेकिन उन्होंने जिसऔरऔर भी

देश की बिगड़ती आर्थिक हालत और राजनीतिक टांग-खिंचाई ने वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी को अंदर तक हिलाकर रख दिया है। इतना कि उनका कहना है कि सरकार सुधार लाने के लिए सभी पार्टियों में सर्वसम्मति बनाने की कोशिश करेगी। उन्होंने मंगलवार को राज्यसभा में एक बहस के दौरान कहा कि औद्योगिक उत्पादन में गिरावट आने के बाद सवाल पूछे जा रहे हैं कि क्या भारत की अर्थव्यवस्था पटरी से उतर जाएगी। लेकिन हम में सामर्थ्य है औरऔरऔर भी

बाजार दो साल के न्यूनतम स्तर को छूकर लौटा है। इस मुकाम पर निवेशकों के विश्वास को फिर से जमाना एकदम टेढ़ी खीर है। बल्कि अभी का जो माहौल है, उसमें हालात के और बदतर होते जाने के ही आसार हैं। सरकार के बयान और कदम बेअसर हैं क्योंकि वे खोखले हैं और उनकी दिशा भी सही नहीं है। आपूर्ति को संभालकर एमसीएक्स में हस्तक्षेप के जरिए कमोडिटी के भाव थामे जा सकते थे। वहीं, करेंसी डेरिवेटिव्सऔरऔर भी

जीवन है तो जरूरतें हैं और जब तक जरूरतें हैं, तब तक उन्हें पूरा करने की इच्छा है। पढ़-लिख खूब बड़ा बनने की इच्छा। खूबसूरत दिखने की इच्छा। किसी दिन आसमान छूने की इच्छा। विदेश जाने की इच्छा। अपने घर के बाद हरे-भरे फार्महाउस में रहने की इच्छा। छोटी-छोटी इच्छाएं हैं तो बड़ी-बड़ी इच्छाएं हैं। खुश रहने की ख्वाहिश, धनवान बनने की इच्छा, राज करने की चाहत, ज्ञानवान बनने की तमन्ना। इन इच्छाओं को जो भी पूराऔरऔर भी

तेजी से हो रहे औद्योगिकीकरण के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था दो साल बाद 2013 में चीन से भी तेज रफ्तार से बढ़ सकती है। यह अनुमान पेश किया है कि वैश्विक सलाहकार फर्म अर्न्स्ट एंड यंग ने। हालांकि अर्न्स्ट एंड यंग ने सोमवार को जारी अपनी रिपोर्ट में आगाह किया है कि भारत को महंगाई को काबू में करने की जरूरत है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस साल भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 7.2 फीसदी हीऔरऔर भी

देश की आर्थिक विकास दर जून तिमाही में पिछली छह तिमाहियों में सबसे कम रही है। फिर भी यह सबसे ज्यादा आशावादी अनुमान से भी बेहतर है। इसीलिए शेयर बाजार पर जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) की विकास दर कम रहने का असर नहीं पड़ा और वह करीब 1.6 फीसदी बढ़ गया। हालांकि वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने जून तिमाही की विकास दर को निराशाजनक करार दिया है। मंगलवार को सरकार की तरफ से जारी आंकड़ों के मुताबिकऔरऔर भी

अगर भारत इसी तरह बढ़ता रहा और आर्थिक ताकत हासिल करता रहा तो हम दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए स्थिरता का स्रोत बन सकते हैं और बेचैन भटक रही वैश्विक पूंजी का सुरक्षित ठिकाना बन सकते हैं। यह आशा जताई है वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने। उन्होंने सोमवार को राजधानी दिल्ली में भारतीय आर्थिक सेवा के स्वर्ण जयंती समारोह में यह बात कही। वित्त मंत्री ने कहा कि आज जैसी वैश्विक जिम्मेदारी है, भारत के ऊपर पिछलेऔरऔर भी

अमेरिकी अर्थव्यवस्था ठहराव की शिकार हो चुकी है, जबकि चीन व भारत की अर्थव्यवस्थाएं तेजी से बढ़ रही हैं और इन देशों का मध्यवर्ग भी तेजी से बढ़ रहा है। इसलिए अमेरिकी कंपनियां अपने देश की सरहदें फलांग कर चीन व भारत के मध्यम वर्ग को पकड़ना चाहती हैं। खुद अमेरिकी सरकार ने अपनी कंपनियों से इन देशों के बढ़ते मध्यम वर्ग का फायदा उठाने को कहा है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार मामलों के वाणिज्य उपमंत्री फ्रांसिस्को सांचेज नेऔरऔर भी

वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने कहा है कि भारत के लिए मुद्रास्फीति सबसे बड़ी चुनौती है। उन्होंने कहा कि महंगाई दर इस साल 6.5 फीसदी से अधिक रहने का अनुमान है। सोमवार को वॉशिंगटन में ‘भारत-अमेरिका आर्थिक व वित्तीय सहयोग’ पर आयोजित सम्मेलन में मुखर्जी ने कहा, ‘‘भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने कई समस्याएं हैं और सबसे बड़ी चुनौती मुद्रास्फीति है।’’ सम्मेलन का आयोजन सीआईआई ने वॉशिंगटन के शोध संस्थान ब्रुकिंग इंस्टीट्यूट के साथ मिलकर किया है। भारत-अमेरिकाऔरऔर भी

अमेरिकी वित्त मंत्री टिमोथी गेटनर ने कहा है कि भारत की आर्थिक वृद्धि से अमेरिका को कोई खतरा नहीं है बल्कि इससे देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में मदद मिल रही है। उन्होंने कहा कि अमेरिका की वही कंपनियां तेजी से आगे बढ़ रही हैं जिन्हें भारत के साथ निर्यात वृद्धि से फायदा पहुंचा है। वॉशिंगटन में ‘अमेरिका-भारत आर्थिक व वित्तीय भागीदारी’ पर आयोजित सम्मेलन में गेटनर ने अपने संबोधन में कहा, ‘‘अमेरिका में उनऔरऔर भी