धन्य हैं लक्ष्मी के ये नए आराधक

जीवन है तो जरूरतें हैं और जब तक जरूरतें हैं, तब तक उन्हें पूरा करने की इच्छा है। पढ़-लिख खूब बड़ा बनने की इच्छा। खूबसूरत दिखने की इच्छा। किसी दिन आसमान छूने की इच्छा। विदेश जाने की इच्छा। अपने घर के बाद हरे-भरे फार्महाउस में रहने की इच्छा। छोटी-छोटी इच्छाएं हैं तो बड़ी-बड़ी इच्छाएं हैं। खुश रहने की ख्वाहिश, धनवान बनने की इच्छा, राज करने की चाहत, ज्ञानवान बनने की तमन्ना।

इन इच्छाओं को जो भी पूरा कर दे, वो भगवान है। जो वरदान दे दे वो देवी है, देवता है। और, देवी-देवता या किसी भी भगवान के पास धन की कोई कमी नहीं होती क्योंकि वे लोगों की इच्छाओं की पूर्ति का साधन बनते हैं और वे लोगों पर नहीं, लोग उन पर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देते हैं। लेकिन लोग अब खुद देवी-देवता व भगवान बनने निकले पड़े हैं, धनवान बनने निकल पड़े हैं। झुंड के झुंड निकल पड़े हैं लोगों की चिंदी-चिंदी ख्वाहिशों व अरमानों को पूरा करने के लिए।

देश में उद्यमशीलता की एक लहर-सी चल पड़ी है। वो जमाने लद गए जब याचना करके लक्ष्मी को बुलाया जाता था। अब तो नए जमाने के दुस्साहसी लोग लक्ष्मी को अपने पीछे आने को बाध्य कर रहे हैं। और, ऐसे दुस्साहियों की संख्या सैकड़ों नहीं, हज़ारों में है। कोई जाति नहीं, कोई बंधन नहीं, कोई काम छोटा या बड़ा नहीं। आईआईटी, आईआईएम से निकला कोई नौजवान कहीं नौकरी करने के बजाय अचानक चेन्नई में ताज़ा सब्जियां बेचने की ऑनलाइन दुकान खोल देता है। दिल्ली आईआईटी से निकला एक छात्र अपने दोस्तों के साथ मिलकर मुफ्त फोटोकॉपी करने की दुकान खोल देता है और देखते ही देखते उसकी फोकटकॉपी हिट हो जाती है जहां वह कागज के पिछले हिस्से पर कंपनियों के विज्ञापन छापता है और छात्रों को फोटोकॉपी कराने की कीमत उन्हें उतने का ही मोबाइल रीचार्ज कूपन देकर लौटा देता है।

23 साल का एक लड़का ऑस्ट्रिया से लौटता है कि हरे पौधे गिफ्ट में देने के विचार को बिजनेस मॉडल बना देता है। मां-बाप कहते हैं पागल हो गया है। लेकिन दो-तीन साल के भीतर मारुति व एयरटेल जैसी तमाम बड़ी कंपनियां उसकी ग्राहक बन जाती हैं और उसे बड़ी टीम बनाकर पौधों के लालन-पालन से लेकर भेजने तक का तामाझामा खड़ा करना पड़ता है। पंद्रह साल पहले बमुश्किल पचास हजार रुपए से शुरू हुई कंपनी जस्ट डायल 2011 तक आते-आते 150 करोड़ रुपए से ज्यादा के धंधे पर 25 करोड़ से ज्यादा का मुनाफा कमा लेती है।

उत्तरी बिहार के गांवों के कुछ इंजीनियर लड़के धान की भूसी से बिजली बनाने की शुरुआत करते हैं और आसपास के दो दर्जन से ज्यादा गांवों को बिजली देने लगते हैं। विदेश तक से पूंजी उनके पीछे-पीछे खिंची चली आती है। फ्लिपकार्ट को अब बहुतेरे लोग जानते हैं। आईआईटी के दो दोस्तों ने साल 2007 में किताबों की ऑनलाइन बिक्री से यह कंपनी शुरू की। अब यह सीडी, मोबाइल फोन, कैमरा व तमाम दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद ऑनलाइन बेचती है। 3000 से ज्यादा लोगों को रोजगार देती है। पिछले साल का कारोबार करीब 75 करोड़ रुपए रहा है।

आईआईआई अहमदाबाद से निकलकर अब दुबई में नौकरी कर रहे अंकित गोयल बताते हैं कि संस्थान के 75 फीसदी छात्र कर्ज लेकर पढ़ाई करते हैं। ज्यादातर का ध्येय यही होता है कि दो-तीन साल नौकरी करके बैंक का कर्ज लौटा दिया जाए। उसके बाद अपना कोई धंधा शुरू किया जाए। अपना मालिक आप बनने का रुझान बढ़ रहा है। पहले पूंजी लगानेवालों का टोंटा लगा रहता है। अब तो कोई अच्छा-सा बिजनेस आइडिया पेश करो, आपको हाथों-हाथ उठानेवाले देश से ही नहीं, विदेश तक से चले जाएंगे। 1981 में एन आर नारायण मूर्ति ने छह दोस्तों के साथ मिलकर इनफोसिस का गठन किया, तब उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ी थी। लेकिन आज 1.42 लाख लोगों को नौकरी और 4.87 लाख लोगों को अपने स्वामित्व में भागीदार बनानेवाली यह कंपनी उद्यमशीलता की प्रतीक बन चुकी है। आज की उद्यमशीलता तो उससे भी आगे निकलने की होड़ में लगी है।

लद गए वो जमाने जब दीपावली के अवसर पर जगमग दिये जलाकर धन-धान्य की कामना की जाती थी। कृषि से निकला यह त्योहार अब खेती-किसानी व गावों की चौहद्दी छोड़ चुका है। रबी की फसल के लिए खेतों को कीट-पतंगों से मुक्त करने का त्योहार अब शहरों के शोर-शराबे का त्योहार बन गया है। यह लक्ष्मी के बुलाने का नहीं, लक्ष्मी को दिखाने का त्यौहार बन गया है। जिसके पास जितनी लक्ष्मी, उसके यहां दिवाली पर उतना ही धूमधड़ाका। कभी हम कृषिप्रधान देश थे। अब देश की अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान 14.35 फीसदी रह गया है। मैन्यूफैक्चरिंग की तो बात छोड़िए, वित्तीय सेवाओं तक का योगदान इससे ज्यादा 17.39 फीसदी है।

गांव-गिरांव छोड़कर लोग निकल पड़े हैं धंधा-पानी की तलाश में, लक्ष्मी की तलाश में। नौकरी मिलने की गुंजाइश बेहद कम है तो अपना रोजी-रोजगार ही सहारा है। अभी कुछ महीने पहले जारी हुए राष्ट्रीय सैंपल सर्वे संगठन (एनएसएसओ) के 66वें चक्र के सर्वेक्षण के अनुसार केवल 8 फीसदी लोग सरकार या बड़ी-बड़ी कंपनियों वाले संगठित क्षेत्र में काम करते हैं। बाकी 92 फीसदी असंगठित क्षेत्र में है। नियमित पगार की बात करें तो देश की 15.6 फीसदी श्रमशक्ति को यह सौभाग्य मिला हुआ है। 33.5 फीसदी कैजुअल काम करनेवाले हैं।

सबसे बड़ा आश्चर्य तो इस बात का है कि राष्ट्रीय स्तर पर 51 फीसदी लोग स्वरोज़गार में लगे हैं। लेकिन ये तथ्य यह भी बताता है कि देश के आधे से ज्यादा लोग किसी न किसी रूप में उद्यमी हैं। वे किसी सरकार की कृपा से नहीं, बल्कि अपनी किस्मत खुद संवारने में लगे हैं। बीस-पच्चीस साल पहले गांवों के बाबूसाहब और पंडितजी लोग पास के कस्बों में पान से लेकर होटल व टायर पंचर तक की दुकान खोलते थे। अब वो सिलसिला काफी आगे बढ़ निकला है। उत्तर प्रदेश के किसी गुमनाम गांव से निकला राजेश सरैया नाम का दलित ब्रिटेन में 40 करोड़ डॉलर (2000 करोड़ रुपए) की कंपनी स्टीलमॉन्ट का सीईओ बन जाता है।

नाम इतने हैं कि गिनाने से जल्दी चुकेंगे नहीं। सामाजिक व राजनीतिक उद्यमशीलता का भी नया दौर बदले अंदाज में चल निकला है। अपने ख्वाब को पूरा करने के लिए लोग औरौं की ख्वाहिशों से जुड़ रहे हैं। औरों की ख्वाहिश पूरी करने से लक्ष्मी आ रही हैं और लक्ष्मी के आने से रोजगार के जरिए उनकी छटा बिखर रही है। इस छटा से अर्थव्यवस्था में नया मूल्य जुड़ रहा है, जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) बढ़ रहा है।

नोट करने की बात यह है कि धीरूभाई या टाटा-बिड़ला व बजाज को पैदा करने के लिए पहले सरकार की जरूरत पड़ा करती थी, लेकिन इनफोसिस के जमाने से ही ऐसा दौर शुरू हुआ जब बहुत कुछ सरकार के बिना हो रहा है। आज की बात का अंत इस श्लोक और दीपावली की शुभकामनाओं के साथ..

ॐ महालक्ष्मीच विद्महे विष्णुपत्नीच धीमहि। तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्।। ॐ शांतिः शांतिः शांतिः।।

[इस लेख का संपादित अंश नवभारत टाइम्स में छप चुका है]

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