शर्म खुद उनको क्यों नहीं आती!

कॉरपोरेट क्षेत्र में बहस छिड़ी है कि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह देश के लिए वरदान हैं या अभिशाप। देश की सबसे बड़ी हाउसिंग फाइनेंस कंपनी, एचडीएफसी के प्रमुख दीपक पारेख जैसे दिग्गज कहते हैं कि डॉ. सिंह के रूप में हमें अब तक के सबसे अच्छे प्रधानमंत्री मिले हैं। वे एकदम बेदाग राजनेता हैं। इसलिए देश के वरदान हैं। वहीं दूसरा पक्ष कहता है कि डॉ. सिंह भले ही स्वच्छतम छवि के नेता हों, लेकिन उन्होंने जिस तरह अपने ‘गणों’ के भ्रष्टाचार से लेकर विपक्ष के अनावश्यक दबाव को चुपचाप सहा है, उससे समूचा देश नीतियों के मामले में लकवाग्रस्त हो गया है। पहले वे नौकरशाह थे तो दुम हिलाने में माहिर थे। अब तो उनकी जुबान भी लंबी हो गई है। लेकिन नेतृत्व क्षमता उनमें नहीं है। इसलिए वे देश के लिए अभिशाप है।

लेकिन एक तीसरा पक्ष भी है जिसकी राय कांग्रेस के राजनीतिक भविष्य का फैसला कर सकती है। अभी पांच राज्यों में और दो साल बाद पूरे देश में इस पक्ष की राय मुखर हो सकती है। वैसे, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मंगलवार को देश में व्याप्त कुपोषण को राष्ट्रीय शर्म का मसला बताया है। उन्होंने राजधानी दिल्ली में हंगामा (हंगर एंड मैलन्यूट्रिशन) रिपोर्ट 2011 को जारी करते हुए कहा, “मैंने पहले भी कई मौकों पर कहा है और फिर दोहराता हूं कि कुपोषण की समस्या राष्ट्रीय शर्म का मसला है। जीडीपी में प्रभावशाली वृद्धि के बावजूद देश में अल्प-पोषण का स्तर अस्वीकार्य रूप से ज्यादा है। हम इस दर को पर्याप्त तेजी से कम करने में सफल नहीं रहे हैं।”

बता दें कि इस रिपोर्ट के आने से पहले देश में पिछले पांच सालों के दौरान जिलास्तर पर कुपोषण का कोई आंकड़ा नहीं था। यह रिपोर्ट सरकार के किसी मंत्रालय या संस्थान ने नहीं, बल्कि हैदराबाद के एक एनजीओ, नांदी फाउंडेशन ने सिटीजंस एलायंस अगेस्ट मैलन्यूट्रिशन और महिंद्रा एंड महिंद्रा जैसे कॉरपोरेट समूह के साथ मिलकर तैयार की है। इसमें सर्वे करनेवालों ने देश के 9 राज्यों में 112 जिलों के 73,000 से ज्यादा घरों में जाकर बात की। पोषण का स्तर जानने के लिए एक लाख से ज्यादा बच्चों की जांच की गई और लगभग 74,000 माताओं से कुपोषण से जुड़ा सारा ऊंच-नीच तफ्सील से जाना-समझा गया।

प्रधानमंत्री ने हंगामा की रिपोर्ट जारी करते वक्त सर्वे के लिए किए गए विशद प्रयास की सराहना है। लेकिन कुपोषण को राष्ट्रीय शर्म बताते हुए उन्होंने एक शब्द भी इस बारे में नहीं बोला कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है। जब 1947 में देश की आजादी के बाद के 64 सालों में से 51 साल कांग्रेस के नेहरू-गांधी परिवार का शासन रहा हो और बाकी 13 सालों में आई दूसरी सरकारों ने भी मोटे तौर पर कांग्रेस की नीतियों का अनुसरण किया हो तो देश के 42 फीसदी बच्चे अगर आज भी कुपोषण के शिकार हैं तो यह ‘जघन्य अपराध’ किसका है? लेकिन नौकरशाह से राजनेता बने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ‘ईमानदारी’ यहां चुप्पी साध गई।

हंगामा की रिपोर्ट करीब 140 पन्नों की है और इसमें जिलावार आंकड़ा दिया गया है। इन आंकड़ों से साबित होता है कि देश के 42 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा, “देश में करीब 16 करोड़ बच्चे 6 साल से कम उम्र के हैं। आनेवाले सालों में ये बच्चे वैज्ञानिक, किसान, अध्यापक, डाटा ऑपरेटर, दस्तकार और सेवा प्रदाता के रूप में हमारी कार्य-शक्ति में शामिल होंगे। इनमें से अनेक सामाजिक कार्यकर्ता भी बनेंगे। हमारी अर्थव्यवस्था और समाज का स्वास्थ्य इस पीढ़ी के स्वास्थ्य में छिपा है। लेकिन हम कुपोषित बच्चों की इतनी भारी तादाद के रहते अपने देश के स्वस्थ भविष्य की आशा नहीं कर सकते।”

हंगामा के सर्वेक्षण में शामिल 112 जिलों के सैम्पल में से 41 उत्तर प्रदेश, 23 बिहार, 14 झारखंड, 12 मध्य प्रदेश, 10 राजस्थान, 6 उड़ीसा और दो-दो जिले हिमाचल प्रदेश, केरल व तमिलनाडु के हैं। कुछ रिपोर्टों में इस सैम्पल को ही कुपोषण से सबसे ज्यादा ग्रस्त जिले बता दिया गया है जो एकदम गलत है। वैसे, प्रधानमंत्री भी हंगामा की रिपोर्ट से राजनीतिक माइलेज लेने में नहीं चूके। उन्होंने रिपोर्ट को उद्धृत करते हुए बताया कि, “सर्वे में केंद्रित किए गए 100 जिलों में पिछले सात सालों के दौरान हर पांच में से एक बच्चे ने स्वीकृत स्वस्थ वजन हासिल किया है। पिछले सात सालों के दौरान कुपोषण मे आई यह 20 फीसदी कमी राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण-3 में बताई गई कमी की दर से ज्यादा है।” पिछले सात साल मतलब 2004 से 2011 तक की अवधि। और, इस दौरान कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए गठबंधन की ही सरकार केंद्र में रही है। मनमोहन सिंह जी! आप धन्य हैं। इन सात सालों में राजनीतिक नेतृत्व की कला आप भले ही न सीख सके हों, लेकिन आपने राजनीतिक लाभ लेने की महीन कला जरूर सीख ली है।

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