जमीन के विस्फोटक मुद्दे पर जयराम, भूमि अधिग्रहण विधेयक अगले हफ्ते

जयराम रमेश ने ग्रामीण विकास मंत्रालय का पदभार संभालते ही जमीन के विस्फोटक मुद्दे को हाथ लगा दिया है। उन्होंने कहा है कि भूमि अधिग्रहण विधेयक का मसौदा अगले हफ्ते के मध्य तक बहस के लिए पेश कर दिया जाएगा और इसके बाद 1 अगस्त से शुरू हो रहे मानसून सत्र में इसे संसद के पटल पर रख दिया जाएगा। सारा देश इस बात से वाकिफ है कि जमीन का मसला उड़ीसा से लेकर पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश तक राजनीतिक रूप से कितना संवेदनशील बन चुका है। इतना कि राहुल गांधी इसी मुद्दे पर किसानों की लामंबदी कर अगले साल उत्तर प्रदेश के चुनावों में कांग्रेस का परचम लहराना चाहते हैं।

इससे ठीक पहले पर्यावरण मंत्री रहते हुए अपना जलवा दिखा चुके जयराम रमेश ने यह भी संकेत दिया है कि भूमि अधिग्रहण पर उनका रुख प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में चल रही यूपीए सरकार की बनिस्बत कांग्रेस आलाकमान सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) के ज्यादा करीब है। बुधवार को उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा, “हम जल्दी ही, अगले हफ्ते के मध्य तक भूमि अधिग्रहण विधेयक का मसौदा सार्वजनिक बहस के लिए पेश कर देंगे। पर्यावरण मंत्रालय में मेरा यही रवैया था और ग्रामीण विकास मंत्रालय में भी यही रहेगा।” विधेयक का मसौदा मंत्रालय की वेबसाइट पर रख दिया जाएगा जिस पर लोग सीधे अपनी प्रतिक्रिया भेज सकेंगे।

इससे पहले उन्होंने ग्रामीण विकास मंत्रालय के राज्यमंत्रियों शिशिर अधिकारी, अगाथा संगमा व प्रदीप जैन और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ व्यापक बातचीत की। साथ ही वे एनएसी के दो सदस्यों से भी मिले। उन्होंने कहा कि जमीन के मालिकों को उचित मुआवजा देने के साथ उन लोगों का भी ख्याल रखना जरूरी है जिनकी आजीविका जमीन के उस टुकड़े से जुड़ी है। उनका कहना था, “बात जमीन के मालिकों को मुआवजे की ही नहीं है, बल्कि ज्यादा महत्वपूर्ण मसला उन लोगों की क्षतिपूर्ति का है जिनकी आजीविका ली जानेवाली जमीन से जुड़ी है। यह सबसे अहम मसला है। मुआवजा दूसरा अहम मसला है।”

उनके मुताबिक जमीन किस मकसद के लिए ली जा रही है, इस पर भी गौर किया जाना चाहिए। देखा जाना चाहिए कि वह जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए है या गोल्फ कोर्स बनाने के लिए। ग्रामीण विकास मंत्री ने अपना झुकाव साफ करते हुए कहा कि उन्होंने भूमि अधिग्रहण विधेयक पर राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) की सिफारिशें स्वीकार कर ली हैं। नोट करने की बात यह है कि पिछले हफ्ते विलासराव देशमुख के मंत्री रहते हुए सरकार ने कहा था कि उसे विधेयक पर एनएसी के कई सुझाव मंजूर नहीं हैं।

एनएसी का सुझाव है कि भूमि अधिग्रहण और इससे प्रभावित होनेवाले किसानों का पुनर्वास एक ही विधेयक में शामिल किया जाए। सरकार का कहना है कि इससे मामला बहुत लंबा खिंच जाएगा। एनएसी का कहना है कि निजी परियोजनाओं के लिए सारी भूमि का अधिग्रहण सरकार ही करे और बाद में वह किसानों को दी गई रकम निजी क्षेत्र के उद्यमी या कंपनी से वसूल ले। सरकार का कहना है कि ऐसा मुमकिन नहीं है। सरकार परियोजना के लिए कुल 30 फीसदी जमीन ही ले सकती है। बाकी जमीन आवश्यक मंजूरियों के बाद निजी क्षेत्र को खरीदनी पड़ेगी।

सबसे ज्यादा टकराव का मुद्दा जमीन के मुआवजे के फॉर्मूले को लेकर है। सोनिया गांधी और उनकी परिषद चाहती है कि किसानों को अपनी जमीन के तत्कालीन बाजार मूल्य का 6 गुना मुआवजा दिया जाए। वहीं, सरकार का कहना है कि किसानों को जमीन के बाजार मूल्य से कम से कम 60 फीसदी ज्यादा मुआवजा मिलना चाहिए। इस तरह एनएसी की बात मानी गई तो किसान को दस लाख रुपए का बाजार मूल्य होने पर जहां एकड़ के लिए 60 लाख रुपए मिल सकते हैं, वहीं सरकार की चली तो उसे 16 लाख रुपए पर संतोष करना पड़ सकता है।

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