हल्ला मेक-इन इंडिया का, बनाया क्या?
डॉ. मनमोहन सिंह की दस साल की सरकार की बात अब पुरानी हो चुकी है। उन्होंने विकास का वैसा नारा भी नहीं दिया था, जैसा पिछले 11 साल से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दे रहे हैं। मेक-इन इंडिया, स्टैंड-अप इंडिया और स्टार्ट-अप इंडिया जैसे नारों की कोई कमी नहीं। ऊपर से हमारे 60 करोड़ देशवासियों की उम्र 25 साल से कम है। इसका बखान खुद हमारी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण तीन हफ्ते ही पहले अमेरिका में कर चुकीऔरऔर भी
चले थे साथ, मगर फासला बढ़ता गया!
साल 1980 में चीन का जीडीपी भारत का 1.63 गुना था। लेकिन आज वो भारत का 4.72 गुना हो चुका है। आखिर हमारे विकास के रास्ते में कहां चूक हो गई? 1980 में चीन की आबादी भारत के कहीं ज्यादा थी। इसकी वजह से भारत की प्रति व्यक्ति आय 582 डॉलर थी, जबकि चीन की प्रति व्यक्ति आय इसकी लगभग आधी 307 डॉलर ही थी। साल 1990 तक भारत की प्रति व्यक्ति आय घटकर 367 डॉलर होऔरऔर भी
युद्ध का उन्माद नहीं, शांति और विकास
युद्ध-विराम की घोषणा हो चुकी है। फिर भी देश का खास-ओ-आम अब भी युद्ध के उन्माद में उलझा हुआ है। उसे कौन समझाए कि यह विनाश का रास्ता है, विकास का नहीं। ऐसे उन्माद से दुनिया की हथियार लॉबी और राजनीतिक सत्ता का ही स्वार्थ सधता है। बाकी किसी का नहीं। इसके बजाय देश में विकास पर व्यापक बहस होनी चाहिए जिसमें हर किसी को शामिल किया जाए, शहर-शहर, गांव-गांव, गली-गली, चाय व पान की दुकानों औरऔरऔर भी
युद्ध अच्छा नहीं है शेयर बाज़ार के लिए
युद्ध अच्छा नहीं। अच्छा है युद्ध विराम हो गया। आरपीजी ग्रुप के चेयरमैन और खुद करीब 370 करोड़ डॉलर नेटवर्थ वाले हर्ष गोयनका का कहना है कि युद्ध अर्थव्यवस्था को कमज़ोर करता है, भले ही वो जीतनेवाले देश की हो। उन्होंने कहा था कि भारत-पाक तनाव से रुपए के डगमगाने, विदेशी निवेशकों के भागने, कच्चे तेल के उछलने का खतरा है। इससे रक्षा खर्च बढेगा, इंफ्रास्ट्रक्चर पीछे चला जाएगा, शेयर बाज़ार डुबकी लगा सकता है। युद्ध केऔरऔर भी






