दुनिया में साल 2020 से 2024 के दौरान सबसे ज्यादा हथियार निर्यात करनेवाले 15 देशों की सूची में भारत का कहीं कोई नाम नहीं है। फिर भी हमारी सरकार के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह हथियार निर्यात में भारत के झंडे गाड़ देने की बात कर रहे हैं। यह निपट संघियों की वही सोच है जो सरस्वती शिशु मंदिर के अध्यापक को प्रोफेसर और अदने-से रेलवे अफसर को भी जीआरएम बताने से नहीं चूकते। दुनिया के हथियार निर्यातऔरऔर भी

युद्ध में बढ़-चढ़कर दावे किए जाते हैं और सतर्क से सतर्क मीडिया तक के पास कोई साधन नहीं होता कि वो पक्के तौर पर कह सके कि किसके दावे सहीं हैं और किसके गलत। लेकिन अपने यहां तो विचित्र स्थिति है। यहां तो लगता है कि खुद भारत सरकार ही देश की सैन्य स्थिति पर भारत की जनता के साथ युद्ध लड़ रही है और हमारे पास दीदा फाड़कर देखने के अलावा कोई चारा नहीं है। ऑपरेशनऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में कुछ भी किसी भी भाव पर खरीद लेने का कोई मतलब नहीं। हालांकि ब्रोकर और जानेमाने निवेश सलाहकार अक्सर हम से यही करवाते हैं। जिन शेयरों में चाल आ गई होती है और वे किसी वजह से बढ़ रहे होते हैं, वे फटाक से उन्हें उठाकर कहते हैं कि खरीद लो। वे निवेशकों की लालच का फायदा उठाते हैं और जब किसी वजह से बाज़ार या वो शेयर गिरता है तो निवेशकों के डरऔरऔर भी

इनका राष्ट्रवाद हिंदू-मुसलमान और भारत-पाकिस्तान कर भोले-भाले देशवासियों का वोट बटोरने तक सीमित है। इसका प्रमाण इन्होंने ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सेना के शौर्य व बलिदान को भुनाने के लिए देश भर तिरंगा यात्रा निकाल कर दे दिया। लेकिन जब भी देशहित की रक्षा की बात आती है तो इनकी रीढ़ की हड़्डी गायब हो जाती है। चाहे वो जून 2020 में गलवान घाटी में चीन द्वारा हमारी 4000 वर्ग किलोमीटर ज़मीन कब्जा करने का मामला होऔरऔर भी

भारत को 2047 तक विकसित देश बनाना अब विशुद्ध जुमला बन गया है। ऐसा इसलिए क्योंकि अभी तक सरकार ने इसका कोई ठोस रोडमैप नहीं पेश किया है। अब तो देश के बाहर ही नहीं, भीतर से भी सरकार की मंशा पर सवाल उठाए जाने लगे हैं। स्टार्टअप फंडिंग से जुड़ी प्रमुख कंपनी ट्रेमिस कैपिटल के सह-संस्थापक पुष्कर सिंह का कहना है कि 2024 में भारत की अर्थव्यवस्था 3.93 ट्रिलियन डॉलर की थी, जबकि चीन की अर्थव्यवस्थाऔरऔर भी