राजनीति और अर्थनीति का सीधा रिश्ता है क्योंकि राजनीति से ही सरकारें बनती हैं जो आर्थिक नीतियों का फैसला करती हैं जिनसे सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था से लेकर कॉरपोरेट जगत तक संचालित होता है। कॉरपोरेट जगत पर असर से शेयर बाज़ार सीधा-सीधा प्रभावित होता है। सरकार कौन-सी बनेगी, यह लोकतंत्र के मौजूदा दौर में चुनावों से तय होता है। इस तरह कड़ी से कड़ी जोड़कर देखें तो चुनावों से शेयर बाज़ार का सीधा रिश्ता बनता है। कैसे? यह साबितऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में आप इंडेक्स फंड के ईटीएफ या म्यूचुअल फंड की इक्विटी स्कीमों के ज़रिए परोक्ष रूप से निवेश कर सकते हैं। लेकिन सीधे निवेश करना है तो संभावनामय कंपनियां चुननी पड़ती हैं, पता करना पड़ता है कि कंपनी का भविष्य क्या हो सकता है। और, आप जानते ही हैं कि कोई भी, यहां तक कि कंपनी का प्रवर्तक भी कंपनी के बारे में सटीक भविष्यवाणी नहीं कर सकता। लेकिन बिना भविष्य का अंदाज़ा लगाए किसीऔरऔर भी

भारत में ट्रेडिंग और लम्बे निवेश का सही संतुलन ही शेयर बाज़ार से कमाने का सबसे सुसंगत व कारगर तरीका है। यह कोई बुरी बात नहीं है कि कंपनी का शेयर दो-चार दिन या तीन-चार हफ्ते में न बढ़े तो उसमें की गई ट्रेडिंग को लम्बे समय का निवेश बना लिया जाए और चार-पांच साल के लिए किया गया निवेश अगर कुछ हफ्तों या महीनों में ही लक्ष्य भेद दे तो ट्रेडर की तरह उसे बेचकर मुनाफाऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में हम-आप जैसे लोगों के लिए लम्बे समय का निवेश एक तरह की ट्रेडिंग है क्योंकि आप वॉरेन बफेट या राकेश झुनझुनवाला की तरह किसी कंपनी का मालिकाना लेने या उसके प्रबंधन में शामिल तो नहीं हो जा रहे। निवेश कुछ साल के बाद बेचेंगे नहीं तो फायदा कैसे होगा! इसलिए लम्बा निवेश भी ट्रेडिंग है। दूसरी तरफ ट्रेडिंग भी छोटे समय का निवेश है। इंट्रा-डे ट्रेडिंग एक दिन के लिए, स्विंग व मोमेंटम ट्रेडिंगऔरऔर भी

कुछ लोग शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग से इसलिए घबराते हैं कि इससे होनेवाली आय को बिजनेस आय माना जाएगा और उन्हें ज्यादा टैक्स देना पड़ेगा। वे यह नहीं समझते कि वे अपनी जेब से नहीं, बल्कि अपनी कमाई पर टैक्स दे रहे हैं। कमाया तभी तो उसका एक हिस्सा टैक्स के रूप में चुकाया। नहीं कमाते तो कहां से टैक्स देते! कहने का सार यह है कि पहले कमाने की सोचें। टैक्स देने के भय से कमानेऔरऔर भी