पहले टेक्निकल एनालिसिस का बड़ा हल्ला था। इसे सिखाने का दावा करनेवाले अच्छा कमा लेते थे। लेकिन अब मुफ्त का इतना माल-मत्ता इंटरनेट पर है कि ऐसे गुरुओं का कोई पुछत्तर नहीं रहा। फिर दौर आया अल्गोरिदम ट्रेडिंग का। इसे भी बताने, सिखाने और बेचनेवाले रिटेल ट्रेडरों के झुंड पर टूट पड़े। लेकिन धीरे-धीरे पता चला कि अल्गो ट्रेडिंग कुछ नहीं, बस कुछ नियमों का पुलिंदा है जिसे किसी को भी ट्रेडिंग करते वक्त ध्यान में रखनाऔरऔर भी

अजीब हाल है। जो लोग आईएएस-पीसीएस नहीं बन पाए वे आईएएस-पीसीएस बनाने का कोचिंग सेंटर चलाने लग गए। जो खुद अपनी शादी नहीं करा पाए वे शादियां कराने की दुकान खोल बैठे। जो खुद वित्तीय बाज़ार में ट्रेडिंग से कमा नहीं पाए. ऐसे तमाम तोतले घर-बैठे ट्रेडिंग सिखाने का चैनल चलाने लगे। समाज में फैली बेरोज़गारी, बढ़ती ज़रूरतों और लोगों के लालच का फायदा उठाकर ऐसे नाकारा लोग महीने में लाखों कमाने लग गए। इससे भी पूरीऔरऔर भी

बराबरी के स्तर पर लड़ाई हो तो रिंग में हो रही बॉक्सिंग की तरह हार या जीत महज एक सहज व स्वाभाविक खेल है। लेकिन हमारे शेयर बाज़ार में बराबरी का यह स्तर देशी-विदेशी संस्थाओं और प्रोफेशनल ट्रेडरों के दायरे से बाहर निकलते ही भेड़ियाधसान बन जाता है। यहां रिटेल ट्रेडर सबसे असहाय जीव है। बाज़ार के इर्दगिर्द हर शाख पर इतने शिकारी बैठे हैं जो उसकी हड्डी तो छोड़िए, चमड़ी तक निचोड़ डालते हैं। लालच कोऔरऔर भी

हर बड़ी कंपनी अच्छी नहीं होती और हर छोटी कंपनी खराब नहीं होती। यह अलग बात है कि एफआईआई जैसे बड़े निवेशकों के लिए छोटी कंपनियां उस ‘मछली जल की रानी है’ की तरह होती हैं जिन्हें ‘हाथ लगाओ डर जाएगी, बाहर निकालो मर जाएगी।’ असल में इन कंपनियों की इक्विटी बेहद कम होती है जबकि एफआईआई की न्यूनतम खरीद भी अपेक्षाकृत बहुत बड़ी होती है। उनके घुसते ही ऐसी कंपनियों के शेयर चढ़ जाते और निकलतेऔरऔर भी