इस हकीकत से कोई इनकार नहीं कर सकता कि विदेशी संस्थागत निवेशक हमारे शेयर बाज़ार के सबसे अहम किरदार बन चुके हैं। ऊपर से मई में अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के चेयरमैन बेन बरनान्के की तरफ से बांड खरीद रोकने के हल्के से बयान से जैसा भूचाल मचा, रुपया तक जमींदोज़ हो गया है, उससे साबित हो गया कि अमेरिका का फैसला हमें कभी भी हिला सकता है। इसे समझते हुए आगाज़ करें इस हफ्ते का…औरऔर भी

बच्चों की पढ़ाई से लेकर रिटायरमेंट की योजना काफी पहले से बनानी होती है। आप जो भी बचाते हैं, उसे मुद्रास्फीति खोखला न कर दे, इसका भी इंतज़ाम करना होता है। यह आप तब तक नहीं कर सकते, जब तक बचत का 20-30% हिस्सा स्टॉक्स में नहीं लगाते क्योंकि कंपनियां ही आपको 12-15% रिटर्न दे सकती हैं। वो भी तब, जब आप सुरक्षित व मजबूत कंपनियों का चयन करें। तथास्तु में आज ऐसी ही कुछ चुनिंदा कंपनियां…औरऔर भी

आपने भी देखा होगा कि किसी स्टॉक के बजाय लोगों की आम दिलचस्पी इसमें होती है कि बाज़ार कहां जा रहा है। जैसे कोई मिलने पर पूछता है कि क्या हालचाल है, उसी तरह शेयर बाज़ार से वास्ता रखनेवाले छूटते ही पूछ बैठते हैं कि सेंसेक्स या निफ्टी कहां जा रहा है। चूंकि सेंसेक्स में शामिल सभी तीस कंपनियां निफ्टी की पचास कंपनियों में शामिल हैं। इसलिए हाल-फिलहाल बाज़ार कहां जा रहा है, का मतलब होता हैऔरऔर भी

एक तरफ अमेरिका का केंद्रीय बैंक उपाय सोच रहा है कि मौजूदा मौद्रिक ढील को कड़ा कैसे किया जाए, हर महीने 85 अरब डॉलर की बांड खरीद के दुष्चक्र से कैसे निकला जाए। दूसरी तरफ डाउ जोन्स सूचकांक गुरुवार को इतिहास में पहली बार 16,000 के पार चला गया क्योंकि बेरोजगारी की दर बिगड़कर 7.3% हो गई है और इसके सुधरकर 6.5% तक आने तक बांड खरीद रुक नहीं सकती। ऐसा है बाज़ार। अब ट्रेडिंग शुक्रवार की…औरऔर भी

इंसान हैं तो भावनाएं हैं और उनका रहना स्वाभाविक भी है। लेंकिन दुनिया में कामयाबी के लिए भावनाओं पर लगाम लगाना पड़ता है। बताते हैं कि भावनात्मक दिमाग और तार्किक दिमाग में 24:1 का अनुपात होता है। पैसे के मामले में हम और भी ज्यादा भावनात्मक हो जाते हैं। हम सब कुछ जानते-समझते हुए भी दिल की ज्यादा सुनते हैं। ट्रेडिंग में कामयाबी के लिए जरूरी है कि हम दिमाग की ज्यादा सुनें। अब रुख बाज़ार का…औरऔर भी