शेयर बाज़ार में सबसे ज्यादा उछल-कूद और धमाचौकड़ी मचाते हैं इंट्रा-डे ट्रेडर। ऐसे ट्रेडर जो खरीद या बिक्री (लॉन्ग या शॉर्ट) की पोजिशन अगले दिन तक नहीं ले जाते। इन्हीं की सक्रियता से बनता है दिन का एडवांस-डिक्लाइन अनुपात, किसी दिन कितने शेयर बढ़े और कितने घटे, इसका अनुपात। अगर यह एक से ज्यादा है तो बाज़ार में खरीद या तेजड़ियों का दम ज्यादा है और एक से कम है तो बिकवाली या मंदडियों का ज़ोर अधिकऔरऔर भी

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक बेचे ही जा रहे हैं। फिर भी कुछ दिन से बाज़ार बढ़ रहा है। लेकिन निफ्टी-50 अब भी अपने शिखर से 10% से ज्यादा नीचे है। सबसे दिमाग में यही सवाल नाच रहा है कि आखिर बाज़ार की तलहटी क्या होगी, जहां से वह पलटकर उठने लगेगा? जब हो जाएगा, तब इसका पता चलेगा। अभी तो इसका सटीक जवाब किसी के भी पास नहीं है। जो है वो केवल कयासबाज़ी है। फिर भी इंसानऔरऔर भी

मुद्रास्फीति से लड़ने में हमारा रिजर्व बैंक तारे गिनता नज़र आ रहा है। उसके ब्याज दर बढ़ाने के बावजूद मुद्रास्फीति थम नहीं रही। अप्रैल में रिटेल मुद्रास्फीति आठ साल के शिखर 7.79% और थोक मुद्रास्फीति 15.08% रही है जो 2011-12 की नई सीरीज का शिखर है। रिजर्व बैंक जिस तरह ब्याज दर और सीआरआर (रिजर्व बैंक के पास बैंकों द्वारा रखे जानेवाली जमा का हिस्सा) बढ़ाकर सिस्टम में धन का प्रवाह रोक रहा है, उसका नकारात्मक असरऔरऔर भी

अमेरिका हर तरह के आर्थिक संकट से निपटने के लिए मुफ्त में नोट छापकर सिस्टम में डालता रहा। साल 2008 के वित्तीय संकट के बाद उसने ऐसा किया। फिर यही काम कोरोना महामारी के दौरान किया। अमेरिका में जितने डॉलर है, उसका लगभग 20% हिस्सा केवल साल 2020 में छापा गया। अमेरिका व अन्य विकसित देशों के केंद्रीय बैंकों को करना यह चाहिए था कि सिस्टम में डाले गए अतिरिक्त नोट संकट हल्का होते ही वापस खींचतेऔरऔर भी

दशकों में पहली बार ऐसा हो रहा है कि मुद्रास्फीति भारत ही नहीं, अमेरिका व यूरोप समेत तमाम विकसित देशों तक के सिर चढ़कर बोल रही है। ऐसे में इन देशों के केंद्रीय बैंकों की पहली प्राथमिकता बन गई है कि सिस्टम में डाले गए नोट वापस खींचो और ब्याज दरें बढ़ा दो। लेकिन इधर खिंचते जा रहे रूस-यूक्रेन युद्ध ने सप्लाई में दिक्कतें पैदा कर दी और महंगाई बढ़ाने का नया आधार बना दिया। अमेरिका नेऔरऔर भी

हम शेयर बाज़ार में रिटेल निवेशकों व ट्रेडरों की ताकत की बात करते रह सकते हैं। लेकिन बढ़ती मुद्रास्फीति ने उन्हें निचोड़ना शुरू कर दिया। नौकरी और काम-धंधे से होनेवाली आय ठहरी पड़ी है। खर्च बढ़ते जा रहे हैं। वह भी तब, जब अभी तक बढ़ती ब्याज दर का असर ईएमआई पर नहीं पड़ा है. सवाल उठता है कि क्या घर-गृहस्थी चलाने के बढ़े खर्च के अनुरूप आम लोगों की आमदनी भी बढ़ने जा रही है? साफऔरऔर भी

अभी तक शेयर बाजार को रिटेल निवेशकों ने संभाल रखा था। लेकिन क्या रिटेल निवेशकों व ट्रेडरों का यह सहयोग आगे भी बना रहेगा? हुआ यह था कि साल 2020 के दूसरे हिस्से और पूरे साल 2021 में शुरुआती गिरावट के बाद लोगों की आय कुछ ज्यादा ही तेज़ी से बढ़ गई। ब्याज दरें भी कम थीं तो इससे उपभोक्ता खपत बढ़ गई। कम ब्याज दर की वजह से वाहनों, मकान और बिजनेस तक के लोन परऔरऔर भी

भारतीय शेयर बाज़ार में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) की होल्डिंग में एक तिमाही में 6% घट गई है। यह सच वित्तीय सेवाओं की प्रमुख वैश्विक फर्म मॉर्निंगस्टार की एक रिपोर्ट में सामने आया है। दिसंबर 2021 की तिमाही में हमारी लिस्टेड कंपनियों में एफपीआई की शेयरधारिता 654 अरब डॉलर हुआ करती थी। यह मार्च 2022 की तिमाही में घटकर 612 अरब डॉलर रह गई। हालांकि यह साल भर पहले मार्च 2021 की तिमाही के 552 अरब डॉलरऔरऔर भी

गंजेड़ी यार किसके, दम लगाके खिसके। यही हाल अपने यहां विदेशी संस्थागत निवेशकों या एफआईआई का है। वे बीते वित्त वर्ष में भारतीय शेयर बाज़ार से करीब 3 लाख करोड़ रुपए की मुनाफावसूली कर चुके हैं और अब भी बेचे जा रहे हैं। बता दें कि साल 2008 के क्रैश के आसपास एफआईआई ने लगभग इतनी ही रकम निकाली थी और अपना बाज़ार 60% से ज्यादा गिर गया था। इस बार तो निफ्टी-50 अपने शीर्ष से अभीऔरऔर भी

हम सभी खुद को सबसे बुद्धिमान और तार्किक समझते हैं। दूसरों की बात या तो खारिज कर देते हैं या तभी मानते हैं, जब वो हमारी राय को पुष्ट करती है। शेयर बाज़ार में भी यही चलता है। तेज़ी की सोचवाले तेज़ी और मंदी की सोचवाले मंदी को तरजीह देते हैं। सावन के अंधे को सब हरा ही हरा दिखता है। लेकिन याद रखें कि हम जैसा सोचते हैं, वैसा दूसरे भी सोचें, यह कतई ज़रूरी नहीं।औरऔर भी