इकनॉमिक्स टाइम्स की खबर के बाद सरकार परेशान हो गई। उसने इस खबर को ही अफवाह बताते हुए कहा कि यह बात एकदम निराधार है कि केंद्र सरकार विदेशी ऋण के बोझ के नीचे दबी है। उसने सफाई दी कि देश पर चढ़े कुल 620.7 अरब डॉलर के ऋण में से सरकार का ऋण केवल 130.8 अरब डॉलर या 21.07% है। यह भी सच है कि देश को अगले नौ महीनों में 267.7 अरब डॉलर का ऋणऔरऔर भी

रिजर्व बैंक के अनुसार भारत के ऊपर चढ़ा विदेशी ऋण मार्च 2022 के अंत तक 620.70 अरब डॉलर था। यह साल भर में 47.10 अरब डॉलर बढ़ा है। वहीं, देश का विदेशी मुद्रा भंडार पिछले दस महीनों में 70 अरब डॉलर घटकर 572.71 अरब डॉलर रह गया है, विदेशी ऋण से 48 अरब डॉलर कम। कुल विदेशी ऋण में से 499 अरब डॉलर लम्बी अवधि का है, जबकि छोटी अवधि या एक साल तक का ऋण 121औरऔर भी

सारा लेनदेन रुपए में। सारी ट्रेडिंग रुपए में। उस शेयर बाज़ार में जहां डॉलर को रुपए में बदलकर निवेश व ट्रेडिंग करनेवाले विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों का पलड़ा सबसे ज्यादा भारी है। ऐसी स्थिति में रुपया अगर डॉलर के मुकाबले गिरता जा रहा है तो इसका कारण व निदान समझना ज़रूरी हो जाता है। नहीं तो हाल उस पादरी जैसा हो जाएगा जो नदी के मंझधार में डूबती बड़ी नांव में ईश्वर का शुक्रिया इस बात के लिएऔरऔर भी

पानी हमेशा नीचे भागता है और अंततः या तो धरती में सोख लिया जाता है या नदी व समुंदर में समा जाता है। लेकिन धन हमेशा ऊपर उसी तरफ भागता है जहां वह ज्यादा बढ़ सकता है। इस समय मुद्रास्फीति पर काबू पाने के लिए अमेरिका समेत तमाम विकसित देश ब्याज दर बढ़ाते जा रहे हैं। इससे वहां के सरकारी बांडों की यील्ड बढ़ गई है और रुपया खोखला होता जा रहा है तो विदेशी निवेशक नौऔरऔर भी

संस्थागत निवेशक शेयर बाजार में कभी भावों को भगवान नहीं मानते। उन्हें अच्छी तरह पता है कि वे भावों को अपनी खरीद या बिकवाली के दम पर आसमान पर पहुंचा या पाताल तक गिरा सकते हैं। इन संस्थागत निवेशकों में तमाम एफपीआई के साथ-साथ देशी म्यूचुअल फंड और एलआईसी जैसी बीमा कंपनियां शामिल हैं। हां, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की ताकत देशी सस्थाओं पर अक्सर भारी पड़ती है। इनका प्रमाण है एचडीएफसी और इन्फोसिस जैसी दमदार कंपनियोंऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में पुराने किस्म के अधिकांश ट्रेडर भावों को भगवान मानते हैं। यह रिटेल ट्रेडर के नज़रिए से एक हद तक सही भी है क्योंकि भावों पर उनका कोई वश नहीं होता। जिस तरह दरिया में दो-चार जग ही नहीं, कई बाल्टी भी पानी डाल देने से कोई फर्क नहीं पड़ता, उसी तरह रिटेल ट्रेडरों की खरीद-फरोख्त का शेयरों के भाव पर कोई खास असर नहीं पड़ता। फर्क पड़ता है बांध का पानी खोलने से। मुश्किलऔरऔर भी

शेयरों के भावों को कभी दिल पर नहीं लेगे, उनको लेकर भावुक नहीं होंगे, तभी उनके पैटर्न को समझ सकते हैं। देखने की पहली चीज यह है कि किसी शेयर में फिलहाल सटोरियों की कितनी सक्रियता है। यह उसमें डिलीवरी वाले सौदों के प्रतिशत से पता चल जाता है। बीएसई व एनएसई की वेबसाइट हर शाम इसकी जानकारी दे देती है। अगर ऐसे सौदे 60-70% से ज्यादा है तो यह उन्हें खरीदने का पहला सिग्नल है। बाकीऔरऔर भी

शेयर बाज़ार लिस्टिंग कंपनियों के उठते-गिरते भावों का ही खेल है। यहां आधे से ज्यादा सौदे तो सटोरियों के होते हैं, जिनका सचमुच खरीदने-बेचने से कोई वास्ता नहीं होता। वे तो बस भाव बोलते हैं और दिन के दिन में भावों का अंतर काटकर निकल जाते हैं। मसलन, शुक्रवार को रिलायंस इंडस्ट्रीज़ में डिलीवरी वाले सौदे 45.44%, विप्रो में 42.19%, टाइटन में 46.67% और भारती एयरटेल में 33.59% ही थे। वैसे, डिलीवरी वाले सौदों का आधे सेऔरऔर भी

डर इस बात का है कि जरा-सी आशा और गहरी निराशा के बीच डूबते-उतराते शेयर बाज़ार में सालोंसाल से ट्रेड कर रहे प्रोफेशनल व रिटेल ट्रेडर कहीं अंततः हाथ न खड़ा कर दें। बोल पड़े कि यह लै अपनी लकुटि कमरिया, बहुतहिं नाच नचायो। ट्रेडरों के लिए इसका कोई व्यावहारिक समाधान तो नहीं नज़र आता। लेकिन विकल्प हो तो उन्हें कुछ समय के लिए निवेशक बन जाना चाहिए। बाजार का कोई भरोसा नहीं। मंदी के माहौल मेंऔरऔर भी

शेयर बाज़ार के ट्रेडर का यूं फ्यूचर्स को छोड़ ऑप्शंस की तरफ भागना काफी चिंताजनक है। कारण यह है कि ऑप्शंस को खरीदना भले ही फ्यूचर्स की तुलना में बहुत सस्ता हो, लेकिन ऑप्शंस में घाटे की खोह बहुत गहरी और उसकी गणना काफी जटिल है, जबकि फ्यूचर्स में घाटे की गणना सीधी-सरल व आसान है। निफ्टी फ्यूचर्स में एक समय तीन ही सीरीज अपलब्ध होती है। जैसे अभी जुलाई, अगस्त व सितंबर की सीरीज में सौदेऔरऔर भी