दिवाली और दिवाला में बस एक मात्रा का ही अंतर है। लेकिन एक उजाला फैलाती है तो दूसरा बरबाद कर देता है। यह दिवाली या दीपावली का सप्ताह है तो हमें मनन करने की ज़रूरत है कि शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में 90-95% रिटेल ट्रेडर घाटा क्यों खाते रहते हैं? उत्तर बड़ा साफ है कि वे बुद्धि से कम और भावनाओं से ज्यादा काम लेते हैं। लेकिन यह बात तो सभी जानते हैं कि हमें ट्रेडिंग हीऔरऔर भी

केंद्र सरकार द्वारा रिजर्व बैंक की सचित निधि पर हाथ साफ करना न केवल अनैतिक, बल्कि देश के वित्तीय स्थायित्व के लिए भी घातक है। शुक्र है कि साल 2008 जैसा वैश्विक वित्तीय संकट दोबारा नहीं आया। बिमल जालान समिति ने तय किया था कि 3 जून 2018 तक रिजर्व बैंक के पास मुद्रा व स्वर्ण पुनर्मूल्यांकन रिजर्व खाते में जो 6.91 लाख करोड़ रुपए पड़े हैं, उसे सरकारी पहुंच से दूर रखा जाए तो सरकार लाखऔरऔर भी

उधर ऊर्जित पटेल ने भारतीय रिजर्व बैक के गवर्नर पद से इस्तीफा दिया, इधर सरकार ने दो दिन बाद ही 12 दिसंबर 2018 को वित्त मंत्रालय में आर्थिक मामलों के सचिव रह चुके शक्तिकांत दास को गवर्नर बना दिया।  तब तक दास की आर्थिक व वित्तीय मामलों की उतनी ही समझ थी जितनी आईएएस की तैयारी और वित्त मंत्रालय में सेवा देते हुए हासिल की थी। अन्यथा उन्होंने इतिहास व पब्लिक एडिमिनिस्ट्रेशन में ही एमए कर रखाऔरऔर भी

रिजर्व बैंक के गवर्नर पद से ऊर्जित पटेल का इस्तीफा देना कोई सामान्य घटना नहीं थी। भारत के केंद्रीय बैंक के आठ दशक से ज्यादा के इतिहास में यह पहली घटना थी, जब किसी गवर्नर ने बीच कार्यकाल में इस्तीफा दिया था। उनका तीन साल का कार्यकाल 4 सितंबर 2019 को खत्म होना था। लेकिन उन्होंने इसके नौ महीने ही इस्तीफा दे दिया। पटेल ने मात्र 88 शब्दों के अपने इस्तीफे में इसकी वजह व्यक्तिगत बताई थी।औरऔर भी

वो 6 नवंबर 2106 की तारीख थी, जब भारतीय रिजर्व बैंक की स्वायत्तता पर पहला हमला हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अचानक रात 8 बजे राष्ट्र के नाम संदेश में ऐलान कर दिया कि रात 12 बजे से 500 और 1000 रुपए के नोटों की वैधता खत्म की जा रही है। कहा गया कि इससे देश में कालाधन, आतंकवाद व नकली नोटों जैसी तमाम समस्याएं खत्म हो जाएगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। मगर, बड़ा अपराध यहऔरऔर भी

शेयर बाज़ार वित्तीय जगत का एक छोटा-सा हिस्सा है। किसी देश के वित्तीय जगत के केंद्र में होता है उसका केंद्रीय बैंक। नोटों के प्रबंधन से लेकर मौद्रिक नीति तक का निर्धारण वही करता है। केंद्रीय बैंक देश के वित्तीय बाज़ार के लिए हृदय का काम करता है। बैंक उसके लिए धमनी तंत्र जैसे हैं। देश की मुद्रा अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगी होगी या सस्ती, बाज़ार की इस क्रिया पर भी अंकुश लगाने का अहम काम केंद्रीयऔरऔर भी

शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग इस मायने में बेहद खतरनाक खेल है क्योंकि यहां नोट से नोट बनाए जाते हैं। हर्र लगे न फिटकरी, रंग भी चोखा आए। शेयरों में निवेश से धन-दौलत तभी बनती है, जब कंपनी अच्छा धंधा करती है। वहां कंपनी प्रबंधन के कौशल व मेहनत से मूल्य का सृजन होता है और उसका एक अंश शेयरधारक होने के नाते हमें मिलता है। लेकिन ट्रेडिंग तो ज़ीरोसम गेम है। एक का नुकसान, दूसरे का फायदा।औरऔर भी

शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग लालच व भय की आदिम भावनाओं का खेल है। इसका नियंत्रण हमारे शरीर मे भीतर ही भीतर रिसने वाला एक हॉर्मोन एड्रेनालाइन करता है। इसे ‘फाइट-ऑर-फ्लाइट हॉर्मोन’ के रूप में भी जाना जाता है। इसका स्राव शरीर में तनावपूर्ण, रोमांचक, खतरनाक या खतरे की स्थिति के जवाब में खुद-ब-खुद होने लगता है। यह प्रकृति की बनाई व्यवस्था है। एड्रेनालाइन हमारे शरीर को अधिक तेज़ी से प्रतिक्रिया करने में मदद करता है। असल मेंऔरऔर भी

देशी-विदेशी संस्थाएं औरों का धन ही शेयर बाज़ार में लगाकर मैनेज करती है। लेकिन लाख टके का सवाल है कि दूसरे के धन को मैनेज करने का यह काम दरअसल होता क्या है? इसमें काम यह नहीं होता कि दुनिया कैसे काम करती है, युद्ध छिड़ा है या शांति है, यहां तक कि अर्थव्यवस्था कैसे काम कर रही है, इससे भी इसका कोई मतलब नहीं होता। यहां तो बस उन स्टॉक्स को पकड़ना होता है जो दूसरेऔरऔर भी

म्यूचुअल फंड से लेकर बैंक, बीमा कंपनियां और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) तक अपने धन पर नहीं, दूसरों के धन पर धंधा करते हैं। दूसरों को जब तक ज्यादा कमाकर देते हैं, तब तक वे उनके साथ बने रहते हैं। नहीं तो छोड़कर कहीं और चले जाते हैं। सभी देशी-विदेशी निवेशक संस्थाएं सिस्टम बनाकर चलती हैं और अमूमन उनका धंधा बराबर बढ़ता ही रहता है। कमाल की बात यह है कि बाज़ार गिरता है, तब भी उनकेऔरऔर भी