देश का नौजवान भाग रहा है। देश में काम नहीं तो विदेश का रुख कर रहा है। पिछले ही महीने भारत के 303 नौजवान निकारागुआ के रास्ते अमेरिका पहुंचने के फेर में फांस में धर लिए गए। भारत से संयुक्त अरब अमीरात, दुबई और फिर चार्टर्ड प्लेन से फ्रांस के वात्री एयरपोर्ट के पहुंचे तो वहां अधिकारियों को संदेह हुआ और बहुत फजीहत के बाद उन्हें लाकर मुंबई एयरपोर्ट पटक दिया गया। इस घटना पर भी वैसीऔरऔर भी

यह सरकार नॉमिनल और रीयल यानी, सतह पर जो दिख रहा है और जो असल में है, उस पर जमकर खेल रही है। चालू वित्त वर्ष 2023-24 के बजट में अनुमान था कि हमारा जीडीपी नॉमिनल स्तर या ऊपर-ऊपर 10.5% बढ़ेगा और 4% मुद्रास्फीति या डिफ्लेटर को घटाने के बाद जीडीपी की रीयल या असल विकास दर 6.5% रहेगी। अब हुआ यह है कि राष्ट्रीय सांख्यिकी संगठन (एनएसओ) ने पूरे वित्त वर्ष का जो पहला अग्रिम अनुमानऔरऔर भी

सरकारी योजनाओं के प्रचार में चुनाव का तड़का लग जाए तो रंग में भंग नही पड़ती, बल्कि रंग पर भंग और ज्यादा चढ़ जाती है। देश फिलहाल आगामी लोकसभा चुनावों के सुपर-मोड में जा चुका है। राम मंदिर के अक्षत घर-घर तक पहुंचा दिए गए हैं। 22 जनवरी को अयोध्या में राम की नई मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा के साथ जो गुबार उठेगा, वो सारे उत्तर भारत को छा लेगा। इसके नीचे धरातल पर दिन अखबारों में हेडलाइंसऔरऔर भी

सर्दी उतर रही है। लेकिन कोहासा व धुंधलका बढ़ता ही जा रहा है। कहीं कुछ साफ नहीं दिख रहा। जिन बैंकिंग व आईटी कंपनियों में उछाल की बदौलत सेंसेक्स और निफ्टी नए ऐतिहासिक शिखर पर पहुंच गए, इन सूचकाकों में शामिल कंपनियों की सालाना रिपोर्ट ही बताती है कि 83% यौन उत्पीड़न के मामले उन्हीं के खिलाफ हैं। क्या शेयर बाज़ार का निवेशक व ट्रेडर इतना संवेदनहीन है कि मुनाफे के चक्कर में ऐसे अनैतिक आचरण कोऔरऔर भी

हमारे विशाल देश भारत में रोज़गार की समस्या विकट सच्चाई है। इसे किसी भी जुमले या हवाबाज़ी से नहीं हल किया जा सकता। हमारी आबादी का मीडियम या मध्यमान 28 साल का है। हमें यह भी समझना होगा कि लोगबाग सरकार से नौकरियां नहीं, बल्कि ऐसी नीतियां चाहते हैं जिनसे रोज़ी-रोज़गार के मौके बढ़ें। मुठ्ठी भर ज्यादा पढ़े-लिखे लोग ही सरकारी नौकरियों के चक्कर में पड़ते हैं और आरक्षण के लिए मारा-मारी करते हैं। बाकी ज्यादातर लोगऔरऔर भी

गजब स्थिति है। सब कुछ ऐड-हॉक है, तदर्थ है। लेकिन जनता को सपना बेचे रहे हैं 1947 में देश को विकसित बनाने का। चुनाव हैं तात्कालिक। भाजपा कार्यकर्ताओं से लेकर अफसरों व कर्मचारियों को उज्ज्वला, आयुष्मान व मुफ्त राशन जैसी सरकारी योजनाओं के प्रचार में झोंक दिया गया है। लेकिन नाम दिया गया है विकसित भारत संकल्प यात्रा। देश में ज़रूरत है कि निजी उद्योगों को शामिल करके रोज़गार की समस्या को युद्धस्तर पर हल किया जाए।औरऔर भी

जिस मानव संसाधन या डेमोग्राफिक डिविडेंड पर हमारी अर्थव्यवस्था का सारा दारोमदार है, वही सबसे ज्यादा उपेक्षित है। देश में 1968 की शिक्षा नीति में तय हुआ था कि केंद्र व राज्य सरकारें मिलकर हर साल जीडीपी का 6% शिक्षा पर खर्च करेंगी। 1986 की नीति में भी यही लक्ष्य दोहराया गया। अभी सबसे नई बनी 2020 की शिक्षा नीति में भी वही लक्ष्य दोहराया गया है। लेकिन हकीकत यह है कि यह लक्ष्य आज तक कभीऔरऔर भी

ज्यादा कर्जदार देश को समृद्ध नहीं माना जा सकता। विकास का अगला पैमाना है कि औसत भारतीय कितना खुशहाल हुआ है? इसे जीडीपी के समग्र आकार से नहीं, बल्कि प्रति व्यक्ति जीडीपी से मापा जाएगा। मार्च 2014 में हमारा प्रति व्यक्ति जीडीपी 1559.86 डॉलर था। यह मार्च 2023 में 2612.45 डॉलर रहा है। यह गणना मौजूदा मूल्यों पर की गई है। अगर नौ सालों में औसत मुद्रास्फीति की दर को 5% मानें तो 2014 के 1559.86 डॉलरऔरऔर भी

निरर्थक बहसों में उलझाकर अवाम का ध्यान भटकाया जा रहा है और देश के भविष्य को खतरे में डाला जा रहा है। राजनीति में राम का घटाटोप तो आर्थिक मोर्चे पर जीडीपी के आकार का वितंडा। जीडीपी पांच ट्रिलियन डॉलर हो जाने का मतलब विकास नहीं होता। विकास का मतलब है देश की समृद्धि और औसत देशवासी की खुशहाली। क्या पिछले नौ सालों में देश समृद्ध हुआ है? देश पर मार्च 2014 में आंतरिक व बाहरी, दोनोंऔरऔर भी

आलोचनाएं बहुत हो रही हैं। पूरा हिसाब लगाकर बताया जा रहा है कि सरकार 2025 या 2026 में भी भारत को पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था नहीं बना पाएगी। सवाल उठाया जा रहा है कि 2047 तक भारत को विकसित देश बनाना महज राजनीतिक जुमला तो नहीं। लेकिन सरकार मदमस्त हाथी की तरह सारी आलोचनाओं की परवाह किए बिना दावे करती जा रही है। इस बीच मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के अंतिम बजट की तैयारियां पूरीऔरऔर भी