मार्च का महीना शेयर बाज़ार में शॉर्ट-सेलिंग करनेवाले ट्रेडरों के लिए वैसे भी खतरनाक होता है। फिर इस बार तो कोरोना के कहर ने हालात को ज्यादा ही संगीन बना दिया है। ऊपर से दुनिया की शीर्ष रेटिंग एजेंसियों में से स्टैंडर्ड एंड पुअर्स ने भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर का अनुमान घटाकर 3.5% और मूडीज़ ने मात्र 2.5% कर दिया है। ऐसी भयंकर निराशा में धन का प्रवाह सूखता जा रहा है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

बाज़ार गिर रहा हो तो शॉर्ट-सेलिंग उसे गिराती ही चली जाती है। गिरावट जब बहुत ज्यादा बढ़ जाती है तो मांग उठती है कि शॉर्ट-सेलिंग पर रोक लगा दी जाए। हफ्ते भर पहले सेबी ने कुछ स्टॉक फ्यूचर्स की पोजिशन लिमिट आधी कर दी, इंडेक्स डेरिवेटिव्स में शॉर्ट-सेलिंग की सीमा बांध दी और कुछ शेयरों पर मार्जिन दर बढ़ा दी। मकसद था बाज़ार की उथल-पुथल को रोकना। वैसे, इधर शॉर्ट-कवरिंग भी चली है। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

शेयर बाज़ार के गिरने पर लोग शॉर्ट-सेलिंग, खासकर ऑप्शंस ट्रेडिंग का रुख करते हैं। मगर, ऑप्शंस में अभी कमाने की कम और गंवाने की प्रायिकता बेहद ज्यादा है। दरअसल, डर व घबराहट का सूचकांक इंडिया वीआईएक्स 24 मार्च को 86.6350 की चोटी पर पहुंच गया तो ऑप्शंस सौदा उल्टा पड़ने की आशंका इस समय चरम पर है। पहले इसका उच्चतम स्तर वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान 17 मार्च 2008 को 85.13 का था। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

पिछले कुछ हफ्तों से जब से शेयर बाज़ार में भारी गिरावट व अनिश्चितता का सिलसिला शुरू हुआ है, तभी से हम बराबर कह रहे हैं कि रिटेल ट्रेडरों को बाज़ार से दूर रहना चाहिए। अन्यथा, वे संस्थाओं की चक्की में पिसकर रह जाएंगे और पलक झपकते ही अपनी ट्रेडिंग पूंजी गवां बैठेंगे। फिर, जब ट्रेडिंग पूंजी ही नहीं रहेगी तो ट्रेड कहां से करेंगे। अपनी पूंजी सुरक्षित रखना ट्रेडिंग का मूलभूत नियम है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

चालू वित्त वर्ष 2019-20 में शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग के लिए आज को मिलाकर अब मात्र छह दिन बचे हैं। शेयर बाज़ार के सबसे बड़े खिलाड़ियों में गिने जाते हैं म्यूचुअल फंड, एलआईसी जैसी बीमा कंपनियां और विदेशी निवेशक संस्थाएं। अमूमन ये सभी संस्थागत निवेशक मार्च अंत में अपनी खरीद बढ़ा देते हैं। इस बार देशी संस्थाएं ज़रूर खरीद रही हैं। लेकिन विदेशी संस्थाओं की बिक्री उनका पूरा कचूमर निकाल दे रही है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

देखते-देखते वित्त वर्ष 2019-20 बीत गया। ट्रेडिंग के लिए इस हफ्ते पांच दिन और अगले हफ्ते दो दिन बाकी हैं। फिर बुधवार, पहली अप्रैल से नया वित्त वर्ष 2020-21 शुरू। तब क्या होगा, पता नहीं। अभी तो पिछले कई हफ्तों से शेयर बाज़ार में कोरोना को कोहराम छाया हुआ है। बाज़ार इस साल जनवरी से अब तक लगभग 30% गिर चुका है। चालू वित्त वर्ष के बाकी सात दिनों का क्या होगा हाल? अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

प्रधानमंत्री ने कोरोना पर गंभीर चिंता जाहिर की। लेकिन कोरोना से अच्छी बात यह हुई कि मांग घटने और रूस व ओपेक देशों में उत्पादन घटाने का समझौता न हो पाने से कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय दाम 18 साल की तलहटी पर आ गए। सरकार इसका लाभ अवाम को देकर देश में माग बढ़ा सकती थी। इससे सुस्त अर्थव्यवस्था थोड़ी चुस्त हो जाती। लेकिन उसने पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज़ बढ़ाकर अपना खजाना भर लिया। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

सरकार अगर सुनने व गुनने को तैयार हो तो संकट से निकलने की सटीक राह बतानेवालों की कोई कमी नहीं है। तमाम अर्थशास्त्री बराबर लिखते रहे हैं। इनके सुझावों का सार यह है कि अभी तक हम देश के शीर्ष 10-15 करोड़ लोगों को ध्यान में रखकर उत्पादन करते रहे हैं। अर्थव्यवस्था का फोकस विदेश के बजाय अगर 125 करोड़ लोगों के घरेलू बाज़ार पर हो तो देश का उद्धार हो सकता है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

सरकार के मंत्री-संत्री और मुख्य आर्थिक सलाहकार तक कह रहे हैं कि चीन के संकट का भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा, बल्कि इससे हमें निर्यात के नए अवसर मिल जाएंगे। लेकिन हकीकत यह है कि चीन हमारा सबसे बड़ा व्यापार भागीदार है। हम उसे कार्बनिक रसायन, यार्न, धातु अयस्क, भवन सामग्री व कपास का निर्यात करते हैं। चीन की अभी की स्थिति से हमें 34.8 करोड़ डॉलर का नुकसान होगा। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

ग्लोबल दुनिया के झटके भारत को भी बराबर तेज़ी से लग रहे हैं। अमेरिका ने घबराकर एक पखवाड़े में दूसरी बार ब्याज दर घटा दी। उधर चीन का आंकड़ा आया कि वहां औद्योगिक उत्पादन में तीन दशकों की सबसे ज्यादा कमी आ गई है। इससे भारत के वित्तीय बाज़ार हिल गए। रिजर्व बैंक ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। सरकारी बांडों पर यील्ड घट गई। शेयर बाज़ार गोता लगा गया। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी