उस्तादों के उस्ताद हैं ऑप्शन राइटर!

ऑप्शंस के भावों की गणना की जटिलता में उतरने से पहले उनकी खरीद-फरोख्त के व्यवहार को थोड़ा और समझने की कोशिश करते हैं। हमने पहले इस सिलसिले में बीमा का उदाहरण लिया था। जब हम एलआईसी से बीमा पॉलिसी खरीदते हैं तो दरअसल हम प्रीमियम देकर अपने जीवन का पुट ऑप्शन खरीद रहे होते हैं। इससे हम अपनी मृत्यु के बाद अपने पर निर्भर परिवार की वित्तीय सुरक्षा हासिल करते हैं। इस मामले में हम ऑप्शन के खरीदार है, जो प्रीमियम अदा करता है। वहीं, एलआईसी ऑप्शन विक्रेता या राइटर है जो प्रीमियम हासिल करता है।

जब तक हमारी मृत्यु नहीं होती, तब तक पूरी पॉलिसी की अवधि तक एलआईसी को साल-दर-साल हम से प्रीमियम मिलता रहता है। ऑप्शन के खेल का यही सार है। खरीदार किसी दिन उसमें निहित रकम पा लेने की आशा में लगातार प्रीमियम देता रहता है, जबकि विक्रेता को हर सेटलमेंट पर प्रीमियम का भुगतान बेरोकटोक मिलता रहता है। प्रीमियन नहीं दिया तो पॉलिसी खत्म। तू तक दिया गया सारा प्रीमियम उसका।

गौरतलब है कि दुनिया में ऑप्शन ट्रेडिंग सबसे पहले शिकागो बोर्ड ऑफ ऑप्शन एक्सचेंज (सीबीओई) में 26 अप्रैल 1873 को शुरू हुई। उसके पास इस समय सौदों का विराट डिजिटल रिकॉर्ड है। उसके डेटा बैंक का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि लंबी अवधि का औसत निकालें तो केवल 12 प्रतिशत ऑप्शन खरीदार ही कमा पाते हैं, जबकि 88 प्रतिशत अपना प्रीमियम डुबो देते हैं। यह बाजार ज़ीरो-सम गेम है। यहां एक का नुकसान दूसरे का फायदा होता है। हर खरीदार पर कोई न कोई विक्रेता होता है। इसलिए शिकागो बोर्ड का ऐतिहासिक डेटा स्पष्ट करता है कि ऑप्शन विक्रेता या राइटर महज 12 प्रतिशत सौदों में गंवाता और 88 प्रतिशत सौदों में कमाता है।

कमाने की यह 88 प्रतिशत प्रायिकता किसी भी धनवान को इस बिजनेस में खींचकर ले आ सकती है। और, देश में ऐसे धनवानों की कभी कमी नहीं रही जो इतनी ज्यादा सुनिश्चित आय पाने के लिए दौड़ नहीं पड़ेगे। आर्थिक राजधानी मुंबई में तो लाखों ऐसे धनवान अटे पड़े हैं। आप अगर महीने में उनको 3 से 5 प्रतिशत भी देने को तैयार हों तो वे आपको लाखों का उधार चुटकी बजाकर दे देंगे। ये इतने उस्ताद होते हैं कि आपका सारा गणित इनके आगे फेल हो सकता है।

ऑप्शन खरीदनेवाला अपनी तरफ से हिसाब लगाता है कि जाएगा तो ज्यादा से ज्यादा उसका प्रीमियम ही जाएगा। विशेषज्ञ भी उसे यही समझाते हैं कि इस सीमित रकम में वह असीमित फायदा कमा सकता है। लेकिन वे यह नहीं बताते कि ऑप्शन खरीदनेवाले ट्रेडर के सामने उन्हें बेचनेवाला ट्रेडर कौन है। ध्यान रखें कि वित्तीय बाजार की ट्रेडिंग में, चाहे वो शेयर बाज़ार का कैश सेगमेंट हो या डेरिवेटिव, चाहे कमोडिटी बाज़ार हो या फॉरेक्स बाज़ार, हमेशा देखना पड़ता है कि सामने से कौन ट्रेड कर रहा है। यह होश न रहे तो हम खुद-ब-खुद मगरमच्छ का निवाला बन जाते हैं।

ऑप्शंस बाज़ार में विक्रेता या राइटर इसी तरह के मगरमच्छ हैं। वे बड़े अनुभवी सूदखोर हैं। उनके पास 88 प्रतिशत सफलता का ट्रैक-रिकॉर्ड है। वे कभी-कभार ही हारते हैं, जिसे वे अपने बिजनेस की मामूली लागत मानते हैं। आप उनसे भी बड़े उस्ताद निकलें, तभी जीत सकते हैं। बता दें कि हमारे शेयर बाज़ार में जब फ्यूचर्स व ऑप्शंस की शुरुआत नहीं हुई थी, तब वे बदला फाइनेसिंग का काम करते थे। अब ऑप्शन राइटर बन गए हैं।

तब के बदला कारोबार के वक्त देश में केवल बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) ही हुआ करता था। उसमें होता यह था कि ट्रेडर निश्चित मार्जिन देकर या आंशिक भुगतान (अमूमन 15 प्रतिशत) करके शेयर खरीद लेता था। उसका सौदा एक पखवाड़े तक खुला रहता था। पखवाड़ा खत्म होने पर वह ब्रोकर को बताता था कि वह शेयरों की डिलीवरी चाहता है या सौदा अगले पखवाड़े तक बढ़ाना चाहता है। सौदा बढ़ाना हो तो ब्रोकर उसके लिए बाकी 85 प्रतिशत भुगतान के लिए फाइनेंस का इंतज़ाम कर देता था। इसके लिए हर पखवाड़े के अंत में शनिवार को विशेष ट्रेडिंग सत्र होता था जिसे बदला फाइनेंसिंग सत्र कहते थे।

यह सत्र आम ट्रेडिंग सत्रों जैसा ही होता था। बस फर्क इतना था कि इसमें शेयरों की ट्रेडिंग नहीं, बल्कि धन की ट्रेडिंग होती थी जिसमें तय यह होता था कि कितने ब्याज पर उसे दिया जाएगा। अमूमन यह धन 2 प्रतिशत प्रति पखवाड़े की ब्याज दर से मिलता था। साल भर में 12 महीने, जिसमें 24 पखवाड़े तो कुल सालाना ब्याज दर हुई 48 प्रतिशत। इतनी ज्यादा ब्याज दर किस धनवान को नहीं खींचती! उस वक्त ऐसे फाइनेंसर थे जो केवल बदला ट्रेडिंग सत्र में ही आते थे, चेकबुक साथ लेकर। वे हमेशा इतनी ब्याज पर उधार देने को आतुर रहते थे।

इसमें उन्हें कोई रिस्क नहीं उठाना पड़ता था क्योंकि जिन शेयरों के एवज में वे फाइनेंस कर रहे थे, उनकी डिलीवरी 85 प्रतिशत दाम चुकाकर उन्हें ही मिलती थी। इस तरह यह शत-प्रतिशत सुरक्षित ऋण था। शेयर भी उनके पास और ऊपर से 48 प्रतिशत सालाना का ब्याज। उस समय अमीर लोगों ही नहीं, कॉरपोरेट घरानों तक ने बदला फाइनेंसिंग में सैकड़ों करोड़ रुपए डाल रखे थे। बदला फाइनेंस का इंतज़ाम करनेवाले कुछ उस्ताद ब्रोकर भी बीच में अपना कमीशन निकाल लेते थे। लेकिन धनवान सूदखारों के आगे उनकी कमाई कुछ भी नहीं थी। वही धनवान आज ऑप्शन राइटर बन गए हैं। जब सामने ऐसे उस्ताद बैठे हों तो उनको हराने के लिए ऑप्शन व बाज़ार पर बेहद गहरी पकड़ ज़रूरी है।

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