ऑप्शन की अवधारणा कोई दुरूह नहीं

एक तो शेयरों के भावों को पकड़ना मुश्किल ही है। ऊपर से उसकी छाया के भाव। फिर उसकी गणना में रिस्क-फ्री बांड की ब्याज दर, धन का समय मूल्य, ब्याज की निरतंर चक्रवृद्धि दर, स्टैंडर्ड डेविएशन, वोलैटिलिटी – इम्प्लायड व सालाना दोनों, फिर ओपन इंटरेस्ट। इतनी सारी जटिलता देखकर किसी का भी माथा घूम जाए। ऑप्शन के भावों की गणना वाकई बड़ी दुरूह है। लेकिन ऑप्शंस की अवधारणा बड़ी आसान व सहज है। उसे हम रोजमर्रा के जीवन में जमकर इस्तेमाल करते हैं।

ऑप्शन के भावों की गणना की जटिलता में उतरने से पहले आइए ऑप्शंस की अवधारणा की सहजता को समझते हैं। हम सभी असल में ऑप्शंस ट्रेडर हैं। किसी न किसी रूप में जीवन में ऑप्शंस का इस्तेमाल करते हैं। मसलन, हमें कोई मकान खरीदना है। बेचनेवाले ने इसका दाम एक करोड़ रुपए बोला और कहा कि आप अभी केवल एक लाख रुपए दे दो तो वह इसे एक महीने के लिए आपके नाम लॉक कर देगा। अगर महीने भर में आपने बाकी 99 लाख रुपए नहीं चुकाए तो आपका एक लाख रुपए का डिपॉजिट बेचने की पेशकश करनेवाला अपने पास रख लेगा।

इस दौरान मकान के दाम बढ़कर अगर 1.10-1.15 करोड़ रुपए हो गए तो आप खुशी-खुशी उसे बाकी 99 लाख रुपए देकर उसे एक करोड़ रुपए में खरीद लोगे। लेकिन अगर घटकर 95 लाख हो गए तो आप सोचोगे कि 95 लाख का मकान एक करोड़ रुपए में खरीदने से अच्छा है कि एक लाख रुपए का डिपॉजिट डूब जाने दिया जाए। यह सारा सौदा एक तरह का कॉल ऑप्शन है। एक करोड़ रुपए उसका स्ट्राइक मूल्य है, जबकि एक लाख रुपए उसके कॉल ऑप्शन का प्रीमियम या भाव। बेचनेवाला ऑप्शन राइटर य बेचने वाला है जिससे आप ऑप्शंस खरीद रहे हैं।

मजे की बात यह है कि इस सौदे में मकान बेचनेवाला अक्सर अच्छी तरह जानता है कि मकान की असली कीमत 90 लाख रुपए ही है। फिर भी वह माहौल बनाकर उसे एक करोड़ रुपए में बेचने की डील कर लेता है और एक लाख रुपए का नॉन-रिफंडेबल डिपॉजिट जमा करवा लेता है। उसे पता है कि खरीदनेवाले को देर-सबेर पता ही चल जाएगा कि यह मकान एक करोड़ रुपए नहीं, बल्कि 90 लाख रुपए का है और वह सौदा पूरा करने के बजाय एक लाख रुपए छोड़ देने का समझदार निर्णय ले लेगा। अगर मूर्खता या लालच में नहीं समझ पाए तो बेचनेवाला 90 लाख रुपए की चीज़ उसे एक करोड़ रुपए में थमाकर 10 लाख रुपए का मुनाफा कमा लेगा। शेयर बाज़ार में कॉल ऑप्शन के राइटर इसी तरह प्रीमियम के दम पर भरपूर कमाई करते हैं।

अब दूसरा उदाहरण आम जीवन में इस्तेमाल हो रहे पुट ऑप्शन का लेते हैं। मान लीजिए कि हम नौकरी या बिजनेस करने लगते हैं। हमारी नियमित आय शुरू हो जाती। शादी होती है। स्वतंत्र परिवार हो जाता है। हमारे ऊपर निर्भर बीवी-बच्चे हो जाते हैं। हमें चिंता होती है और बीमा कंपनियां इस तरह से मार्केटिंग भी करती हैं कि हम दुर्भाग्य से नहीं रहे तो परिवार व बच्चों का क्या होगा। हम फौरन 20-25 साल बाद मैच्योर होनेवाली जीवन बीमा प़ॉलिसी ले लेते हैं। मान लीजिए कि 25 साल की एक करोड़ रुपए की शुद्ध टर्म इंश्योरेंस पॉलिसी का सालाना प्रीमियम 6000 रुपए है।

इसमें हम अपनी असमय मृत्यु का रिस्क जीवन बीमा कंपनी पर डाल दे रहे हैं। हम साल दर साल प्रीमियम देते रहें और 25 साल की मीयाद न भी पूरी हुई हो। फिर भी अगर बीच में ही कभी हमारी मौत हो जाए तो हमारे परिवार को एक करोड़ रुपए की पूरी बीमित रकम मिल जाती है। दरअसल, इस सौदे में हमने अपनी ज़िंदगी और मौत पर बीमा कंपनी से पुट ऑप्शन खरीदा है। अगर हम पूरे 25 लाख ज़िंदा रहे तो सारा का सारा प्रीमियम बीमा कंपनी का हो जाएगा और बीच में मर गए तो बीमा कंपनी हमें एक करोड़ रुपए दे देगी।

इसमें हम भी ज्यादा से ज्यादा जीना चाहते हैं ताकि परिवार की देखभाल कर सकें। दूसरी तरफ बीमा कंपनी भी चाहती है कि हम ज्यादा से ज्यादा जीवित रहें ताकि उसे अधिकतम साल तक प्रीमियम मिलता रहे और इस तरह बीमा की मीयाद पूरी हो गई तो उसे बीमित रकन नही देनी पड़ेगी। इस पुट ऑप्शन सौदे में आप न रहने पर परिवार की सुरक्षा की चिंता से मुक्त हो गए और रहने पर बीमा कंपनी का लाभ। दोनों की ही जीतने की, विन-विन स्थिति। एक साल की साधारण बीमा या स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी भी एक तरह का पुट ऑप्शन है जिसमें आप लाभ लें या न ले सकें, आपका प्रीमियम बीमा कंपनी को मिल ही जाता है। लेकिन आपको आकस्मिक खर्च का रिस्क कवर मिला रहता है।

अब शायद आपको एहसास हो गया होगा कि हम जीवन में किस तरह ऑप्शन ट्रेड का इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन जिस तरह बीमा के बिजनेस में प्रीमियम तय करने का काम काफी जटिल होता है। बाकायदा इसके लिए एक्चुअरी की पढ़ाई करनी पड़ती है, उसी तरह ऑप्शंस में भावों या प्रीमियम को समझने के लिए कुछ जटिल गणनाएं सीखनी और करनी पड़ती है। लेकिन यह काम बहुत ज्यादा मुश्किल नहीं है। कैसे, यह हम देखेंगे आगे की कड़ियों में।

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