चालू वित्त वर्ष 2013-14 के पहले महीने अप्रैल में देश के औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) में मात्र दो फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि अर्थशास्त्री व अन्य विश्लेषक एक दिन पहले तक इसके 2.4 से 2.7 फीसदी तक बढ़ने का अनुमान लगा रहे थे। महीने भर पहले मार्च में आईआईपी 2.5 फीसदी बढ़ा था। औद्योगिक उत्पादन के इस तरह उम्मीद से कम बढ़ने से शेयर बाज़ार को थोड़ी निराशा हुई और बीएसई सेंसेक्स 0.53 फीसदीऔरऔर भी

हम थोक मूल्य सूचकांक (WPI) पर आधारित थोक मुद्रास्फीति को मुद्रास्फीति ही कहें और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) पर आधारित खुदरा मुद्रास्फीति को महंगाई मानें तो महंगाई की दर मई में घटकर 9.31 फीसदी पर आ गई है। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) की तरफ से बुधवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक मई 2013 में सीपीआई 129.2 दर्ज किया गया है, जबकि साल भर पहले मई 2012 में यह 118.2 रहा था। इस तरह इस सूचकांक के बढ़नेऔरऔर भी

आमतौर पर ग्वार की खेती करनेवाले किसान मार्च तक अपनी सारी फसल बाज़ार में उतार देते हैं। लेकिन इस साल उन्होंने खींच-खांच कर करीब डेढ़ महीने और इंतज़ार किया। जैसे ही उनकी फसल खलिहान से निकलकर बाज़ार में पहुंच गई, सरकार ने ग्वार और ग्वार गम की फ्यूचर ट्रेडिंग पर तेरह महीने पहले, मार्च 2012 से लगाया गया बैन उठा लिया। फॉरवर्ड मार्केट कमीशन (एफएमसी) के फैसले के बाद एमसीएक्स और एनसीडीएक्स ने मंगलवार, 14 मई 2013औरऔर भी

जनगणना के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि देश में 1991 के बाद से किसानों की संख्या करीब 1.50 करोड़ घट गई है, जबकि 2001 के बाद यह कमी 77 लाख से थोड़ी ज्यादा है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो पिछले बीस सालों में हर दिन औसतन 2035 काश्तकार या किसान अपनी स्थिति से बेदखल होते जा रहे हैं। जानेमाने कृषि विशेषज्ञ और अंग्रेज़ी अखबार ‘द हिंदू’ में ग्रामीण मामलों के संपादक पी साईनाथ ने अपने एकऔरऔर भी

शेयर बाज़ार के मंजे हुए ट्रेडरों की बात अलग है। लेकिन उन लोगों के लिए, जिन्होंने शेयर बाज़ार में अभी-अभी ट्रेडिंग शुरू की होती है, स्टॉप लॉस लगते ही जैसे कलेजे से एक कतरा कटकर नीचे गिर जाता है। लगता है कि किसी ने सरे-राह जेब काट ली। हालांकि स्टॉप लॉस किसी भी ट्रेडर के जीवन का एक अपरिहार्य हिस्सा है। गिरते हैं घुड़सवार ही मैदान-ए-जंग में। लेकिन स्टॉप लॉस को लेकर मन में कोई खांचा फिटऔरऔर भी

तंत्र के भीतर तंत्र। सत्ता के समानांतर सत्ता। भारतीय समाज व अर्थतंत्र में ऊपर-ऊपर दिख रही धाराओं के नीचे न जाने कितनी धाराएं बह रही हैं। ये विलुप्त सरस्वती भी हो सकती हैं और घातक कर्मनाशा भी। सहारा समूह ऐसी ही एक अनौपचारिक धारा का नाम है। धंधा तो है लोगों से पैसे जुटाना। लेकिन तरीका आम बैंकिंग से एकदम अलग। धंधे पर कई-कई परतों के परदे। तरह-तरह की बातें। कुछ भी पारदर्शी नहीं। पारदर्शिता के नामऔरऔर भी

नए वित्त वर्ष 2013-14 के बजट में सिक्यूटिरीज ट्रांजैक्शन टैक्स (एसटीटी) को लेकर वित्त मंत्री पी चिदंबरम के साथ-साथ बजट दस्तावेजों ने भी जिस तरह का भ्रम पैदा किया है, उससे बड़े-बड़े चार्टर्ड एकाउंटेंट तक गच्चा खा जा रहे हैं। अभी हाल ही में मुंबई के मशहूर चार्टर्ड एकाउंटेंट विमल पुनमिया ने एक सेमिनार में बताया था कि शेयर बाज़ार में कैश डिलीवरी वाले सौदों पर एसटीटी खत्म कर दिया गया है। अलग से ‘अर्थकाम’ के पूछनेऔरऔर भी

यकीन नहीं आता। लेकिन कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय की तरफ से निवेशकों को पूंजी बाज़ार में पारंगत बनाने के लिए जारी 156 पेज की नई किताब के पेज नंबर 84 पर बताया गया है कि, ‘भारतीय बाज़ार में केवल रिटेल निवेशकों को ही डे-ट्रेड की इजाज़त है।’ डे ट्रेडिंग का मतलब शेयरों की उस खरीद-फरोख्त से है, जिन्हें दिन के दिन में निपटा लिया जाता है। बाज़ार बंद होने से पहले ही सारी पोजिशंस काट ली जाती हैं।औरऔर भी

वित्त मंत्री ने वित्त विधेयक 2013 के जरिए आयकर कानून 1961 में 49 नए प्रावधान जोड़े हैं। सरकार अमूमन हर साल आयकर कानून में ऐसे पचास संशोधन करती है। कभी-कभी तो यह संख्या सौ तक पहुंच जाती है। पचास का औसत मानें तो 1961 में बने इस कानून में अब तक के 52 सालों में ढाई हज़ार से ज्यादा संशोधन हो चुके होंगे। मुंबई की जानीमानी लॉ फर्म डीएम हरीश एंड कंपनी के पार्टनर अनिल हरीश कहतेऔरऔर भी

बजट का शोर थम चुका है। विदेशी निवेशकों को जो सफाई वित्त मंत्री से चाहिए थी, वे उसे पा चुके हैं। अब शांत हैं। निश्चिंत हैं। बाकी, अर्थशास्त्रियों का ढोल-मजीरा तो बजता ही रहेगा। वे संदेह करते रहेंगे और चालू खाते का घाटा, राजकोषीय घाटा, सब्सिडी, सरकार की उधारी, ब्याज दर, मुद्रास्फीति जैसे शब्दों को बार-बार फेटते रहेंगे। उनकी खास परेशानी यह है कि धीमे आर्थिक विकास के दौर में वित्त मंत्री जीडीपी के आंकड़े को 13.4औरऔर भी